
भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के संचालन से वर्ष 2040 तक करीब 113 अरब अमेरिकी डॉलर (USD 113 Billion) की विदेशी मुद्रा बचत हो सकती है। यह दावा डेलॉयट इंडिया (Deloitte India) और नाइट फ्रैंक इंडिया (Knight Frank India) की एक संयुक्त स्टडी में किया गया है, जिसमें भारत को वैश्विक उच्च शिक्षा के उभरते केंद्र के रूप में पेश किया गया है।
‘Global Universities Eye India Opportunity: The Next Big Leap in Higher Education’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को सौंपी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की विशाल जनसंख्या, नीतिगत सुधार और शहरों के स्तर पर बेहतर होते शैक्षणिक इकोसिस्टम ने भारत को दुनिया के अग्रणी विश्वविद्यालयों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बना दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इस समय उच्च शिक्षा की उम्र के करीब 15.5 करोड़ (155 मिलियन) युवा हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है। यह संख्या 2030 तक बढ़कर 16.5 करोड़ (165 मिलियन) होने का अनुमान है। सरकार ने 2035 तक सकल नामांकन अनुपात (GER) 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन देश की मौजूदा उच्च शिक्षा क्षमता इसे पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी कारण हर साल बड़ी संख्या में भारतीय छात्र अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का रुख करते हैं, जबकि इन देशों में वीजा नियम लगातार सख्त हो रहे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के तहत किए गए सुधारों और यूजीसी (UGC) व इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी (IFSCA) द्वारा बनाए गए नए नियमों ने विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भारत में स्वतंत्र रूप से काम करने के कई रास्ते खोल दिए हैं। इनमें ऑफशोर कैंपस, जॉइंट वेंचर और ट्रांसनेशनल एजुकेशन मॉडल शामिल हैं। इन पहलों को टैक्स छूट, आसान नियमों और प्रस्तावित सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम का भी समर्थन मिल रहा है। अब तक 18 विदेशी विश्वविद्यालयों को सैद्धांतिक या अंतिम मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें से तीन कैंपस सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
डेलॉयट इंडिया के पार्टनर साहिल गुप्ता ने कहा कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितता और कड़े इमिग्रेशन नियमों के कारण विदेशी विश्वविद्यालय पारंपरिक पश्चिमी देशों से आगे के विकल्प तलाश रहे हैं। उनके अनुसार, “भारत की जनसांख्यिकीय ताकत और यूजीसी व IFSCA के नीतिगत सुधारों ने विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भारत में लंबे समय तक टिकाऊ संचालन का एक ऐतिहासिक अवसर पैदा किया है।”
रिपोर्ट का अनुमान है कि 2040 तक भारत में संचालित विदेशी विश्वविद्यालय 5.6 लाख से अधिक छात्रों को शिक्षा दे सकते हैं। इससे न केवल 113 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा बचत होगी, बल्कि 1.9 करोड़ वर्ग फुट (19 मिलियन वर्ग फुट) विशेष शिक्षा से जुड़े रियल एस्टेट की मांग भी पैदा होगी।
स्टडी में 40 भारतीय शहरों का मूल्यांकन करते हुए एक सिटी रेडीनेस फ्रेमवर्क भी पेश किया गया। इसमें दिल्ली-एनसीआर को विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए सबसे तैयार बाजार बताया गया है, जबकि बेंगलुरु और मुंबई दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे।चंडीगढ़ और कोच्चि जैसे टियर-2 शहरों को भी मध्यम स्तर की तैयारी वाला माना गया है, जो अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के लिए नए विस्तार विकल्प बन सकते हैं।
नाइट फ्रैंक इंडिया के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर शिशिर बैजल ने कहा कि भारत वैश्विक उच्च शिक्षा विस्तार के लिए सबसे मजबूत संभावनाओं में से एक है। उनके अनुसार, “15.5 करोड़ युवाओं और मजबूत आर्थिक रफ्तार के साथ भारत दीर्घकालिक शिक्षा मांग की गारंटी देता है। विदेशी विश्वविद्यालयों की एंट्री से अकादमिक गुणवत्ता बेहतर होगी, रिसर्च सहयोग बढ़ेगा और आर्थिक गतिविधियों को नया बल मिलेगा।”
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत में विदेशी उच्च शिक्षा संस्थानों की एंट्री न केवल शिक्षा प्रणाली के वैश्वीकरण की दिशा में अहम कदम है, बल्कि इससे नवाचार, उद्योग–शिक्षा सहयोग और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी।




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