
भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा है कि देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं को संविधान की भावना के अनुरूप काम करना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि न्यायिक प्रक्रियाएं और अदालती फैसले आम नागरिकों को उनकी अपनी भाषाओं में उपलब्ध हों। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा न्याय तक पहुंच में बाधा नहीं बननी चाहिए।
इस्लामिया कॉलेज परिसर में हिंदी सेवा निधि ट्रस्ट के 33वें वार्षिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि संविधान में भाषा से जुड़े जो प्रावधान किए गए हैं, उन्हें पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू करने की जरूरत है। उनका कहना था कि अदालतों की कार्यवाही—चाहे वह लिखित हो, मौखिक बहस हो या अंतिम फैसला—लोगों की समझ की भाषा में होनी चाहिए, ताकि न्याय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बन सके।
प्रधान न्यायाधीश ने बताया कि इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह सतर्क है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत अंग्रेजी अभी भी सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक भाषा बनी हुई है, लेकिन भाषा की दूरी को कम करने के लिए कई अहम कदम उठाए जा चुके हैं।
16 भारतीय भाषाओं में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का अनुवाद
CJI सूर्यकांत ने जानकारी दी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का 16 भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसका उद्देश्य यह है कि देश का कोई भी नागरिक अपने राज्य या क्षेत्र की भाषा में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की प्रामाणिक प्रति पढ़ और समझ सके। इससे न केवल न्यायिक पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि आम लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी मजबूत होगा।
तकनीक और एआई की बढ़ती भूमिका
प्रधान न्यायाधीश ने न्यायिक प्रणाली में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित एप्लिकेशन और अन्य आधुनिक तकनीकी साधन इस दिशा में बड़ा सहारा बन रहे हैं। यदि इनका सही और जिम्मेदार तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो पूरी कानूनी प्रक्रिया को सरल भाषा में समझाना संभव है।
उन्होंने कहा कि तकनीक के माध्यम से लोगों को उनकी अपनी भाषा में कानूनी जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है, जिससे न्याय व्यवस्था अधिक समावेशी बनेगी। CJI सूर्यकांत के अनुसार, न्याय तभी सशक्त होगा, जब आम नागरिक उसे समझ सके और उससे सीधे जुड़ सके।




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