
भारत तेजी से ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां तकनीक और डेटा समाज की दिशा तय कर रहे हैं। जैसे-जैसे जीवन की गुणवत्ता और नागरिक अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ी है, सामाजिक न्याय की भूमिका भी पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है। अपराध की जांच में पुलिस की भूमिका के साथ-साथ फॉरेंसिक विभाग अब न्याय प्रणाली की रीढ़ बनता जा रहा है। यह क्षेत्र अब केवल जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नैतिकता, वैज्ञानिक सोच और समस्या सुलझाने की क्षमता का अहम हिस्सा बन चुका है। साइबर फॉरेंसिक, डीएनए विश्लेषण और डिजिटल सबूतों के बढ़ते मामलों ने प्रशिक्षित विशेषज्ञों की मांग को नई ऊंचाई दी है।
थ्योरी से आगे, व्यवहारिक शिक्षा की जरूरत
आज जरूरत ऐसी शिक्षा की है जो केवल किताबों तक सीमित न हो, बल्कि छात्रों को वास्तविक समस्याओं से जूझने के लिए तैयार करे। फॉरेंसिक साइंस अब सिर्फ एक करियर विकल्प नहीं, बल्कि देश में सच और न्याय को मजबूत करने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। यही कारण है कि बीते एक दशक में भारत में फॉरेंसिक शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है।
वर्ष 2010 में जहां देश में केवल 9 विश्वविद्यालय फॉरेंसिक डिग्री देते थे, वहीं 2009 के बाद 10 राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय (NFSU) स्थापित किए गए। खासकर 2020 के बाद इस क्षेत्र में निवेश और संस्थानों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही 165 से अधिक निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों ने भी फॉरेंसिक साइंस से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू किए हैं।
संस्थानों की बढ़ोतरी, लेकिन विशेषज्ञों की कमी
हालांकि संस्थानों की संख्या बढ़ी है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि देश की 26 फॉरेंसिक लैब्स में वैज्ञानिक पदों पर करीब 40 प्रतिशत से ज्यादा रिक्तियां अभी भी बनी हुई हैं। यह आंकड़ा बताता है कि शिक्षा और जरूरत के बीच अब भी बड़ा अंतर है।
इस चुनौती से निपटने के लिए विश्वविद्यालयों को बहु-स्तरीय रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले, कड़ी ट्रेनिंग से गुजर चुके छात्रों को पेड इंटर्नशिप देकर लैब्स की तत्काल जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। दूसरा, योग्य ग्रेजुएट्स को स्थायी नियुक्ति देकर लंबे समय के लिए विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। तीसरा, सेवानिवृत्त फॉरेंसिक विशेषज्ञों की सेवाएं लेकर अस्थायी समाधान निकाला जा सकता है, जिससे सभी स्वीकृत पदों के भरने तक लैब्स का काम प्रभावित न हो।
देश को कितनी फॉरेंसिक लैब्स चाहिए?
भारत में 806 जिले, 27 राज्य स्तरीय फॉरेंसिक साइंस लैब्स, लगभग 80 क्षेत्रीय एफएसएल और 9 केंद्रीय फॉरेंसिक लैब्स (CFSL) हैं। बढ़ते अपराध, डिजिटल सबूतों और मामलों की जटिलता को देखते हुए विशेषज्ञ संस्थानों और लैब्स का बड़े स्तर पर विकास अब जरूरी हो गया है। इसके बिना न्याय व्यवस्था पर बढ़ता दबाव संभालना मुश्किल होगा।
विश्वविद्यालय और पुलिस के बीच सहयोग जरूरी
कुछ विश्वविद्यालय, जैसे सेंट्यूरियन, प्रैक्टिकल फॉरेंसिक ट्रेनिंग को प्राथमिकता देकर एक मजबूत मॉडल पेश कर रहे हैं। ऐसे संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाकर विशेषज्ञों की एक स्थायी श्रृंखला तैयार की जा सकती है। साथ ही, स्किल-बेस्ड शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालय अगर राज्य पुलिस के साथ मिलकर काम करें, तो यह अकादमिक दुनिया और कानून व्यवस्था के बीच की दूरी को कम कर सकता है।
इस तरह के सहयोग से छात्रों को अत्याधुनिक लैब्स और पुलिस स्टेशनों में वास्तविक मामलों पर काम करने का मौका मिलेगा। इससे वे सीधे तौर पर जॉब-रेडी स्किल्स विकसित कर सकेंगे। दूसरी ओर, राज्य पुलिस को भी प्रशिक्षित युवा टैलेंट मिलेगा, जिससे कुछ ही महीनों में फॉरेंसिक पदों की बड़ी कमी को काफी हद तक पूरा किया जा सकेगा।
फैकल्टी और ट्रेनिंग पर निवेश जरूरी
फॉरेंसिक साइंस में योग्य शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। इसे दूर करने के लिए पीएचडी योग्य शिक्षाविदों के साथ-साथ अनुभवी वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों को विज़िटिंग या एडजंक्ट फैकल्टी के रूप में जोड़ा जा सकता है। इसके साथ ही युवा फैकल्टी के लिए फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम्स में निवेश जरूरी है, ताकि उनकी लैब स्किल्स और रिसर्च क्षमता मजबूत हो सके।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वर्चुअल लैब्स भी इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इससे छात्रों को ऐसे शिक्षकों से सीखने का अवसर मिलेगा, जिनके पास अकादमिक ज्ञान के साथ वास्तविक फील्ड अनुभव भी हो।
आगे का रास्ता
आने वाला समय उन छात्रों के लिए बेहतर अवसर लेकर आएगा, जो सामान्य डिग्री से आगे बढ़कर प्रैक्टिकल समझ विकसित करना चाहते हैं। इंडस्ट्री और न्याय प्रणाली दोनों को ऐसे ही प्रोफेशनल्स की जरूरत है, जो पढ़ाई के साथ-साथ काम करने का अनुभव भी रखते हों। यही मॉडल न सिर्फ छात्रों के करियर को मजबूत करेगा, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था को भी नई ताकत देगा।




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