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NEET-UG केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: “उच्च शिक्षा पाने का अधिकार हल्के में नहीं लिया जा सकता”

NEET-UG केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: “उच्च शिक्षा पाने का अधिकार हल्के में नहीं लिया जा सकता”

NEET-UG केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: “उच्च शिक्षा पाने का अधिकार हल्के में नहीं लिया जा सकता”

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कहा है कि किसी भी छात्र का उच्च या प्रोफेशनल शिक्षा पाने का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है और इसे बिना ठोस आधार के कम नहीं किया जा सकता। जस्टिस जसमीत सिंह ने टिप्पणी की कि भले ही संविधान के भाग-III में यह अधिकार स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के रूप में नहीं लिखा गया है, लेकिन राज्य की यह सकारात्मक जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों को उच्च शिक्षा पाने का अवसर सुनिश्चित करे।

हर्षित अग्रवाल की याचिका पर मिला राहत भरा फैसला

यह फैसला हर्षित अग्रवाल नाम के छात्र की याचिका पर आया, जिसने 5 मई 2024 को NEET-UG परीक्षा दी थी। उसे ओडिशा के भीमा भोई मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, बालांगीर में MBBS सीट मिली थी। उसकी ऑल इंडिया रैंक 28,106 और जनरल कैटेगरी रैंक 11,234 थी। यानी प्रवेश पूरी तरह मेरिट के आधार पर था।

लेकिन कथित पेपर लीक मामले में CBI जांच के बाद उसका नाम संदिग्ध सूची में डाल दिया गया और बाद में उसका स्कोरकार्ड वापस ले लिया गया। इसके बाद कॉलेज ने उसका एडमिशन रद्द कर दिया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए अग्रवाल ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

दूसरे छात्र को मिली राहत, लेकिन हर्षित से छीन लिया गया अधिकार

अग्रवाल की दलील थी कि उसी सूची में शामिल एक अन्य छात्र को सुप्रीम कोर्ट ने पढ़ाई जारी रखने और परीक्षा देने की अनुमति दी है। ऐसे में उसके साथ भेदभाव क्यों?

NTA के कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के बावजूद उसका स्कोरकार्ड रद्द किया गया, जबकि CBI ने उसे मामले में सिर्फ गवाह बताया था। CBI के अनुसार इस मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और अग्रवाल आरोपी नहीं है।

कोर्ट: “गंभीर आधार के बिना एडमिशन रद्द नहीं किया जा सकता”

कोर्ट ने कहा कि हर्षित अग्रवाल को मेरिट के आधार पर सीट मिली थी, इसलिए उसका एडमिशन रद्द करने के लिए ठोस और वैध कारण जरूरी थे। CBI द्वारा उसे आरोपी के बजाय गवाह बताना ही यह साबित करता है कि उसके खिलाफ किसी गड़बड़ी का प्रारंभिक सबूत तक नहीं था।

जस्टिस जसमीत सिंह ने टिप्पणी की “NEET-UG जैसी प्रवेश परीक्षा पास कर छात्र जो कीमती अधिकार हासिल करता है, उसे मनमाने निर्णयों से खत्म नहीं किया जा सकता। बिना मजबूत आधार के एडमिशन रद्द करना उसकी पढ़ाई में अनावश्यक रुकावट पैदा करता है।”

MBBS क्लास में शामिल होने का आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि हर्षित अग्रवाल को तुरंत MBBS कक्षाओं में शामिल होने दिया जाए और वह अपने सिलेबस के अनुसार पढ़ाई जारी रख सके।

फैसले का महत्व

यह फैसला सिर्फ एक छात्र के लिए राहत नहीं, बल्कि व्यापक रूप से शिक्षा अधिकार पर महत्वपूर्ण संदेश देता है—

– उच्च शिक्षा तक पहुँच किसी विशेषाधिकार की नहीं बल्कि अधिकार की बात है।

– अगर कोई आरोप सिद्ध न हो, तो छात्रों की शिक्षा बीच में रोकना न्यायसंगत नहीं।

– जांच लंबी चलने के बावजूद छात्रों का करियर दांव पर नहीं लगाया जा सकता।

यह निर्णय उन हजारों छात्रों के लिए भी उम्मीद की किरण है जो परीक्षा से जुड़ी जांचों और प्रशासनिक भ्रम की वजह से प्रभावित होते हैं।

एडइनबॉक्स टीम

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