Edinbox Hindi
कार्यस्थल पर ‘शाडेनफ्रायड’: दूसरों की असफलता पर खुशी क्यों आती है और इससे कैसे निपटें

कार्यस्थल पर ‘शाडेनफ्रायड’: दूसरों की असफलता पर खुशी क्यों आती है और इससे कैसे निपटें

कार्यस्थल पर ‘शाडेनफ्रायड’: दूसरों की असफलता पर खुशी क्यों आती है और इससे कैसे निपटें

कार्यस्थल पर प्रतिस्पर्धा आम बात है। बेहतर प्रदर्शन, प्रमोशन और पहचान की दौड़ में कई बार हमारे मन में ऐसी भावनाएं जन्म ले लेती हैं, जिन्हें हम खुलकर स्वीकार नहीं करते। कभी किसी सहकर्मी के साथ कुछ गलत हो जाए और मन के किसी कोने में हल्की-सी खुशी महसूस हो—तो यह अनुभव असहज जरूर होता है, लेकिन असामान्य नहीं। दूसरों की परेशानी या असफलता से खुशी महसूस करने की इस मानवीय भावना को जर्मन भाषा में ‘शाडेनफ्रायड’ कहा जाता है। तेज प्रतिस्पर्धा वाला कामकाजी माहौल इस भावना को और भी मजबूत कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी भावना का आ जाना अपने आप में गलत नहीं है, क्योंकि यह मानव स्वभाव का हिस्सा है। समस्या तब शुरू होती है, जब यह भावना हमारे व्यवहार में झलकने लगे या अनैतिक रूप ले ले। शोध बताते हैं कि अगर समय रहते इस भावना को समझ लिया जाए और उस पर आत्म-नियंत्रण रखा जाए, तो इसे संतुलित किया जा सकता है और इसका असर कार्यसंस्कृति पर नकारात्मक नहीं पड़ता।

जब किसी सहकर्मी की परेशानी देखकर मन में संतोष या खुशी जैसा एहसास हो, तो सबसे पहला कदम है उसे पहचानना। अक्सर यह भावना खुद की तुलना दूसरों से करने के कारण आती है। हम अनजाने में खुद को बेहतर महसूस कराने के लिए किसी और की कमजोरी पर ध्यान देने लगते हैं। ऐसे में अगर संभव हो, तो सहयोग का रास्ता अपनाना ज्यादा फायदेमंद होता है। किसी की मदद करना न सिर्फ माहौल को बेहतर बनाता है, बल्कि हमारे भीतर की नकारात्मकता को भी कम करता है।

ऐसी स्थिति में थोड़ा ठहरकर आत्मचिंतन करना भी जरूरी है। खुद से यह सवाल पूछना कि क्या मैं सच में ऐसा महसूस करना चाहता हूं, या क्या कभी ऐसी स्थिति मेरे साथ भी आ सकती है। जब हम खुद को सामने वाले की जगह रखकर देखने की कोशिश करते हैं, तो वह व्यक्ति हमें सिर्फ अपनी गलती से पहचाना हुआ नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में नजर आने लगता है। यही सोच धीरे-धीरे नकारात्मक भावनाओं की तीव्रता को कम कर देती है।

सबसे अहम बात यह है कि इस तरह की भावना हमारे व्यवहार में न दिखे। किसी सहकर्मी की असफलता पर गपशप करना, उसकी छवि खराब करने की कोशिश करना या जानबूझकर सहयोग न देना कार्यस्थल के लिए बेहद नुकसानदेह होता है। इससे टीमवर्क कमजोर पड़ता है और ऐसा माहौल बनता है, जहां लोग एक-दूसरे का साथ देने के बजाय नीचे गिराने की सोचने लगते हैं। लंबे समय में यह न केवल संगठन, बल्कि व्यक्तिगत रिश्तों को भी नुकसान पहुंचाता है।

इस भावना से निपटने का सबसे सकारात्मक तरीका है आत्म-सुधार पर ध्यान देना। दूसरों की असफलता पर सोचने के बजाय, इस ऊर्जा को अपने काम, कौशल और सोच को बेहतर बनाने में लगाना ज्यादा उपयोगी है। जब व्यक्ति सीखने, मेहनत करने और अपने पेशेवर विकास पर ध्यान देता है, तो तुलना अपने आप कम हो जाती है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और काम के प्रति नजरिया भी ज्यादा सकारात्मक बनता है।

कार्यस्थल पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा जरूरी है, लेकिन इंसानियत और सहयोग उससे भी ज्यादा अहम हैं। भावनाओं को समझना और स्वीकार करना ठीक है, पर उन्हें ऐसे व्यवहार में बदलने से बचना जरूरी है जो न खुद के लिए अच्छे हों, न दूसरों के लिए। यही संतुलन एक बेहतर और भरोसेमंद कार्यसंस्कृति की नींव रखता है।

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed