Edinbox Hindi

अफगानिस्तान में तालिबान के स्कूल बैन से लड़कियों में बढ़ रही हताशा 

अफगानिस्तान में नए सेशन के लिए स्कूल खुल गए, पढ़ाई चालू हो गयी लेकिन सेकेंड्री स्कूलों से लड़कियां नदारद हैं। वजह तालिबान का वह प्रतिबन्ध है जो 12 साल से अधिक उम्र की लड़कियों को पढ़ाई के लिए स्कूल जाने से रोकता है। तालिबान द्वारा लड़कियों की पढ़ाई पर प्रतिबंध लगाए हुए 900 दिन बीत चुके हैं। उम्मीद थी कि इस बार यह प्रतिबन्ध उठा लिया जाएगा और लड़कियां स्कूलों में नजर आएंगी लेकिन अफसोस एक और शिक्षा सत्र के लिए सेकेंड्री स्कूलों में लड़कियों के दाखिले पर तालिबान का प्रतिबंध कायम रहा। इस प्रतिबन्ध के कारण अब लड़कियों में हताशा बढ़ रही है। 

यह तीसरा साल है जब स्कूलों में किशोर लड़कियों का दाखिला अभी भी प्रतिबंधित है। हालांकि तालिबान ने बार-बार वायदा किया था कि इससे संबंधित मसलों के हल हो जाने के बाद प्रतिबंध हटा लिया जाएगा। इन मुद्दों में इस्लामिक पाठ्यक्रम भी शामिल है। लेकिन ऐसा हो न सका, स्कूलों से लड़कियों की दूरी आज भी बनी हुई है। अफगान किशोर लड़कियां प्रतिबंध के आगे बेबस हैं, लाचार हैं। तीन साल से निराशा और हताशा के भंवर में डूबी ये लड़कियां अब तो यहां तक कहने लगी हैं कि वो ‘मानसिक तौर पर मृत’ महसूस करने लगी हैं। 

16 साल की महताब ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ‘असलियत में जब हम सोचते हैं तो लगता है कि हम सिर्फ जिंदा हैं। आप हमें अफगानिस्तान में चलती-फिरती लाश कह सकते हैं। मेरा मतलब है कि हम शारीरिक रूप से जिंदा तो हैं लेकिन मानसिक रूप से मृत हैं।’ कुछ ऐसी ही बात कई अन्य लड़कियों ने भी अलग-अलग मीडिया से बातचीत में कही है, जो इन दिनों देखे-पढ़े जा सकते हैं। कहें तो इन लड़कियों ने अब उम्मीद का दामन भी छोड़ दिया है कि अब कभी वे स्कूल का मुंह भी देख पाएंगी। 
यूनिसेफ के मुताबिक, तालिबान के इस प्रतिबंध से लगभग 14 लाख अफगान लड़कियां प्रभावित हैं। हालांकि 12 महीने पहले भी तालिबान ने प्रतिबंध हटाने की उम्मीद जाहिर की थी, जो अब कमजोर पड़ने लगी है। तालिबान के प्रमुख प्रवक्ता का कहना है कि प्रतिबंध हटाने में कुछ समस्याएं और कमियां थीं, लिहाजा इसपर अंतिम फैसला नहीं किया जा सका।

गौरतलब है कि तालिबान ने देश की सत्ता पर कब्जा करने के बाद सितम्बर 2021 में सबसे पहले लड़कियों को सेकेंड्री स्कूलों से निष्कासित कर दिया था और फिर उन्हें वापस जाने से रोक दिया गया। बाद में कार्यकारी उप शिक्षा मंत्री अब्दुल हकीम हेमत ने कहा था कि जब तक इस्लामिक और अफगान की परम्पराओं के अनुरूप नई शिक्षा नीति नहीं बन जाती लड़कियों को सेकेंड्री स्कूलों में पढ़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी। ऐसे में लगा था कि 2022 में शुरू होने वाले शिक्षा सत्र में यह मुद्दा निपट जाएगा और प्रतिबंध हटा लिए जाएंगे, लेकिन तब ऐसा नहीं हो सका था। तब से लगातार इसे लेकर उम्मीद तो जताई गई मगर वह उम्म्ीद हकीकत के धरातल पर आज तक नहीं उतर पाई है। नतीजतन, मार्च 2024 में शुरू हुए नए सत्र में भी तीन लाख 30 हजार लड़कियां सेकेंड्री स्कूल में दाखिला नहीं ले पाईं। ऐसे में कितनी ही होनहार लड़कियां अपने सपने को अंधेरी खोह में दफन होता महसूस कर रही हैं।

पीएचडी का सपना देखने वाली तमन्ना कहती हैं, ‘यह बहुत मुश्किल दौर है। लगता है जैसे हम काल कोठरी में रह रहे हों। ईमानदारी से कहूं तो मुझे नहीं पता कि ऐसी सरकार में स्कूल खुलेंगे भी कि नहीं, जिसको लड़कियों के बारे में जरा सी भी समझ नहीं है। वे लड़कियों को कुछ नहीं मानते।’ ऐसे में कई अभिभावक जो अपनी बच्चियों को पढ़ाना चाहते हैं, वे अफगानिस्तान भी छोड़ने की कोशिशें कर रहे हैं लेकिन उन्हें इसमें सफलता मिलना आसान नहीं हो रहा। जैनब के पिता कहते हैं कि ‘हमारी बच्चियों के पास सरकार नियंत्रित धार्मिक स्कूलों या मदरसे में ही जाने का एकमात्र विकल्प है और हम उन्हें वहां भेजना नहीं चाहते। यह स्कूल का विकल्प नहीं है। वे उन्हें केवल धार्मिक विषय ही पढ़ाएंगे।’

हालांकि तालिबान के प्रतिबंधों के बाद अफगानिस्तान में कई जगहों पर चोरी-छिपे अंग्रेजी की कक्षाएं चलाई जा रही हैं, जहां बच्चियां जा भी रही हैं। मगर यह इस बड़ी समस्या का समाधान नहीं साबित हो सकता। कई लड़कियां आॅनलाइन कोर्स या अफगान बच्चों के लिए चलाए जाने वाले बीबीसी दर्स के कार्यक्रमों को देख कर अपनी पढ़ाई को जारी रखे हुए हैं, मगर अफगानिस्तान जैसे मुल्क में यह भी परिहार्य नहीं। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रीजनल कैंपेनर समीरा हामिदी के मुताबिक, जब परिवार पर्याप्त भोजन जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जैसा कि पूरे अफगानिस्तान का ही हाल है, तो ऐसे में अपनी बेटियों के लिए आॅनलाइन शिक्षा ‘प्राथमिकता’ में नहीं होता। वह चेताती हैं कि अफगानिस्तान की अधिकांश लड़कियों का भविष्य अंधकारमय है। 

उल्लेखनीय है कि शिक्षा पर प्रतिबंध ही इकलौता मामला नहीं है जिसका सिर्फ लड़कियां सामना कर रही हैं। दिसम्बर 2022 में महिलाओं से कहा गया कि वो अब यूनिवर्सिटी में नहीं जा सकतीं। इसके अलावा एक नियम भी लाया गया कि महिलाएं कितनी दूर तक बिना अपने पुरुष रिश्तेदार के जा सकती हैं, वो क्या पहन सकती हैं, कौन सी नौकरियां कर सकती हैं और यहां तक कि स्थानीय पार्कों में जाने तक की मनाही कर दी गई। ऐसे हालात में गोपनीय स्कूलों और आॅनलाइन शिक्षा का दायरा बढ़ाकर भी बहुत कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। ऐसा देश जहां 10 लाख से अधिक लड़कियां शिक्षा के बुनियादी अधिकार पर प्रतिबंध झेल रही हैं, वहां ये कोशिशें बहुत पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत है अंतरारष्ट्रीय जगत की ओर से तालिबान पर तत्काल और संतुलित दबाव डालने की। साथ ही पूरे देश में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए व्यापक मदद की भी।

लेकिन जबतक ये होता है जैनब और तमन्ना जैसी लड़कियों को चहारदीवारी में ही रहना होगा। और यह चहारदीवारी अफगानी  ल्ड़कियों के लिए किसी काल कोठरी से कम नहीं। 

रईस अहमद 'लाली'

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed