Edinbox Hindi
भारत सरकार की मुफ्त कोचिंग योजना में सामान्य वर्ग क्यों बाहर?

भारत सरकार की मुफ्त कोचिंग योजना में सामान्य वर्ग क्यों बाहर?

भारत सरकार की मुफ्त कोचिंग योजना में सामान्य वर्ग क्यों बाहर?

एक अहम पहल के तहत भारत सरकार ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के माध्यम से Physics Wallah (PW) के साथ साझेदारी कर मुफ्त कोचिंग की शुरुआत की है। इस कदम को शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है और इसकी सराहना भी हो रही है। लेकिन इसी बीच यह योजना विवादों में भी है, क्योंकि इसमें सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के छात्रों को शामिल नहीं किया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं—इस तरह की नीतियों में सामान्य वर्ग के छात्रों की जगह कहां है?

सामान्य वर्ग के छात्रों की अनदेखी 

एक बार फिर सामान्य वर्ग के छात्र इस तरह की योजनाओं से बाहर रह गए हैं, जबकि आरक्षित वर्गों को बेहतर अवसर मिल रहे हैं। वर्षों से सामान्य वर्ग के छात्र एक तरह के नीतिगत खालीपन में जी रहे हैं। यह मान लिया जाता है कि वे आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं और अपने दम पर सब कुछ संभाल सकते हैं।

हकीकत यह है कि लाखों सामान्य वर्ग के छात्र निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग परिवारों से आते हैं, जहां आय महीने के खर्च पूरे करने में ही खत्म हो जाती है। महंगी कोचिंग, जिसका खर्च लाखों रुपये तक पहुंच सकता है, उनके लिए सपना बन जाती है। न उन्हें आरक्षण का लाभ मिलता है, न ही वे अधिकतर लक्षित योजनाओं के पात्र होते हैं। अब मुफ्त कोचिंग से भी वे बाहर कर दिए गए हैं।

कठोर विरोधाभास

भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं बेहद कठिन हैं। सामान्य वर्ग के छात्रों को सबसे ऊंचा कट-ऑफ झेलना पड़ता है, पूरी फीस देनी होती है, उम्र में कोई छूट नहीं मिलती और न ही कोई सुरक्षा कवच होता है। कम सीटों के लिए कड़ी शर्तों के साथ मुकाबला करना पड़ता है। तैयारी के लिए वे अक्सर परिवार की बचत या कर्ज पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में जब मुफ्त कोचिंग जैसी योजना उनके बिना लागू होती है, तो यह प्रगति नहीं बल्कि एक और याद दिलाने जैसा लगता है कि उनसे चुपचाप सहने की उम्मीद की जाती है।

इस स्थिति को और कठिन बनाती है उनकी अदृश्यता। नीतियों में सामान्य वर्ग के छात्रों की परेशानियों को शायद ही कभी जगह मिलती है। उनके तनाव को अक्सर ‘हकदारी’ कहकर टाल दिया जाता है। उनकी असफलताओं को व्यक्तिगत कमी मान लिया जाता है, न कि व्यवस्था की खामियों का नतीजा। लंबे समय तक बिना संस्थागत सहयोग के पढ़ाई करना, पात्रता शर्तों के कारण अवसर हाथ से निकलते देखना और बार-बार “एडजस्ट करने” की सलाह सुनना—यह सब आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक दबाव बढ़ाता है, जिसकी शायद ही कभी सही गिनती होती है।

मुफ्त कोचिंग योजना जरूरी है, लेकिन…

इस पहल का विरोध कोई नहीं कर रहा है। लेकिन जब सहायता को आर्थिक जरूरत की बजाय केवल श्रेणियों के आधार पर तय किया जाता है, तो असंतुलन पैदा होने का खतरा रहता है। ऐसे कई सामान्य वर्ग के छात्र हैं जो आर्थिक रूप से उन लोगों से भी कमजोर हैं, जिन्हें सहायता मिल रही है। कई परिवार एक संकट दूर हैं टूटने से। उनके लिए यह बहस वैचारिक नहीं, बल्कि सीधी और दर्दनाक सच्चाई है।

मुफ्त कोचिंग एक बंद दरवाजे जैसी क्यों लगती है

Physics Wallah के साथ भारत सरकार की मुफ्त कोचिंग पहल शिक्षा क्षेत्र में बड़ा कदम है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जब पात्रता सीमित रखी जाती है, तो सामान्य वर्ग के छात्रों को एक संदेश मिलता है—“खुद ही रास्ता निकालो।”

जब प्रतिस्पर्धा पहले से कहीं ज्यादा है, निजी कोचिंग आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है और डिजिटल शिक्षा भी खर्च मांगती है, तब इस तरह बाहर होना सिर्फ अनुचित नहीं लगता, बल्कि ऐसा लगता है जैसे व्यवस्था ने उन्हें भुला दिया हो।

समानता का मतलब चुनिंदा समर्थन नहीं होना चाहिए

भारत को खुद से एक असहज लेकिन जरूरी सवाल पूछना होगा—अगर लक्ष्य समान अवसर है, तो आर्थिक जरूरत को मुख्य आधार क्यों नहीं बनाया जाता? केवल मेहनत और प्रेरणा से मेरिट टिक नहीं पाती। इसके लिए संसाधन, मार्गदर्शन और समय चाहिए, जो अक्सर पैसों से मिलता है। इस सच्चाई को नजरअंदाज करना व्यवस्था को मजबूत नहीं करता, बल्कि उस पर भरोसा कमजोर करता है।

अब क्या किया जा सकता है?

सरकार और PW की यह पहल जैसे-जैसे आगे बढ़े, नीति निर्माताओं के पास दिशा सुधारने का मौका है। समावेशन का मतलब यह नहीं कि एक वर्ग से अवसर छीनकर दूसरे को दे दिए जाएं। इसका मतलब है नजरिया इतना व्यापक करना कि जरूरतमंद हर छात्र तक मदद पहुंचे, चाहे वह किसी भी वर्ग से हो। संतुलन के बिना, अच्छी मंशा वाली योजनाएं भरोसा बढ़ाने की बजाय चुपचाप असंतोष पैदा कर सकती हैं।

सामान्य वर्ग के छात्रों की यह कोई शॉर्टकट की मांग नहीं है। यह निष्पक्षता की अपील है। यह देखे जाने की मांग है। यह याद दिलाने का प्रयास है कि समानता को चुनिंदा नहीं बनाया जा सकता और चुप्पी को सहमति नहीं समझा जाना चाहिए।

भारत को व्यावहारिक होना होगा

अगर भारत सच में शिक्षा का लोकतंत्रीकरण करना चाहता है, तो इस बातचीत का दायरा बढ़ाना होगा। एक ऐसी व्यवस्था, जो हमेशा एक ही वर्ग से त्याग, समझौता और इंतजार की उम्मीद करती है, अंततः उसी भरोसे को खो देती है, जिस पर वह टिकी होती है।

सामान्य वर्ग के छात्र भी छात्र हैं, सामान्य वर्ग के लोग भी लोग हैं—तो फिर बलिदान की उम्मीद हमेशा उनसे ही क्यों? दूसरों को जो कम प्रयास में मिल रहा है, उसके लिए उन्हें ज्यादा मेहनत क्यों करनी पड़ती है? आखिर एक सवाल अब भी कायम है—अगर शिक्षा समान अवसर का वादा करती है, तो समानता शुरुआत में ही क्यों रुक जाती है?

सवाल कई हैं, लेकिन सामान्य वर्ग को जवाब एक ही मिलता है—हम समावेशन में विश्वास रखते हैं। पर क्या कोई नीति-निर्माताओं से यह कहने को तैयार है कि यह समावेशन नहीं, बल्कि चयनात्मकता है?

एडइनबॉक्स टीम

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed