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बजट में कृषि शिक्षा और रिसर्च पर कटौती, आत्मनिर्भर खेती के दावों पर उठे सवाल

बजट में कृषि शिक्षा और रिसर्च पर कटौती, आत्मनिर्भर खेती के दावों पर उठे सवाल

बजट में कृषि शिक्षा और रिसर्च पर कटौती, आत्मनिर्भर खेती के दावों पर उठे सवाल

भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में बजट केवल सरकारी खर्च का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह उन करीब 14 करोड़ किसान परिवारों के भविष्य की दिशा तय करता है जिनकी आजीविका सीधे खेती से जुड़ी है। कृषि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ही वे वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और नीति-निर्माता तैयार होते हैं जो आने वाले दशकों में खेती को आधुनिक बनाएंगे। लेकिन बजट 2026-27 के आंकड़े इस मोर्चे पर गंभीर चिंता पैदा करते हैं। सरकार भले ही ‘आत्मनिर्भर किसान’ और ‘आधुनिक खेती’ की बात कर रही हो, पर कृषि शिक्षा और प्रबंधन के लिए आवंटन में 27 प्रतिशत की भारी कटौती ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कृषि शिक्षा और प्रबंधन का बजट 708.94 करोड़ रुपये से घटाकर 514.87 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह कटौती सीधे-सीधे कृषि विश्वविद्यालयों के आधुनिकीकरण, नई प्रयोगशालाओं, अपडेटेड सिलेबस और योग्य शिक्षकों की उपलब्धता को प्रभावित करेगी। ऐसे में यह आशंका गहराती है कि कहीं हमारे कृषि संस्थान केवल डिग्री देने तक सीमित न रह जाएं। सवाल सीधा है—अगर नई पीढ़ी को आधुनिक तकनीक, डेटा-आधारित खेती और जलवायु-अनुकूल फसल प्रणालियों की शिक्षा नहीं मिलेगी, तो भविष्य की चुनौतियों से निपटेगा कौन?

सरकारी दावों के उलट, बजट के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि खेती को लेकर युवाओं को जोड़ने की रणनीति कागजों तक सीमित रह गई है। साल भर खेती और किसान को प्राथमिकता बताने के बाद, जब संसाधन देने की बारी आती है तो शिक्षा और शोध जैसे दीर्घकालिक निवेश सबसे पहले कटौती का शिकार हो जाते हैं। नतीजा यह है कि किसान आज भी पारंपरिक खेती के दायरे से बाहर निकलने में संघर्ष कर रहा है। बजट 2026-27 में साफ दिखता है कि सरकार का फोकस तात्कालिक सब्सिडी और नकद हस्तांतरण के प्रबंधन तक सिमट गया है, जबकि दीर्घकालिक सुधारों के लिए कोई ठोस उत्साह नहीं दिखता। बढ़ती महंगाई और खेती की लागत के सामने यह आवंटन ऊंट के मुंह में जीरे जैसा प्रतीत होता है।

कृषि अनुसंधान के मोर्चे पर भी तस्वीर उत्साहजनक नहीं है। कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) का बजट 4.7 प्रतिशत घटाकर 10,466 करोड़ रुपये से 9,967 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह कटौती ऐसे समय में हुई है जब जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, अनियमित बारिश और तापमान में बढ़ोतरी खेती के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रही है। राष्ट्रीय कृषि नीति से जुड़ी रिसर्च बताती है कि कृषि अनुसंधान में लगाया गया एक रुपया औसतन 11.69 रुपये का रिटर्न देता है, जबकि पशु विज्ञान में यह रिटर्न 20 रुपये से भी अधिक हो सकता है। इसके बावजूद ICAR जैसे प्रमुख संस्थानों के बजट में कटौती करना भविष्य की खाद्य सुरक्षा को कमजोर करने जैसा कदम माना जा रहा है।

बजट की एक और सच्चाई ‘संशोधित अनुमानों’ में सामने आती है। वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए करीब 1.27 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन वर्ष के अंत में वास्तविक खर्च 1,23,089.30 करोड़ रुपये ही हो पाया। यानी तय लक्ष्य से लगभग 3.3 प्रतिशत कम। यह बचे हुए करीब 4,200 करोड़ रुपये किसी बचत का संकेत नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर योजनाओं को लागू करने में प्रशासनिक अड़चनें हैं। एक ओर खेती की लागत बढ़ रही है, दूसरी ओर आवंटित धन भी पूरा खर्च नहीं हो पा रहा। ऐसे में बजट में दिखने वाली मामूली बढ़ोतरी वास्तव में घटते निवेश की कहानी कहती है।

अगर बड़ी तस्वीर देखें तो स्थिति और भी गंभीर लगती है। देश की कुल जीडीपी में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का योगदान करीब 18 प्रतिशत है, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 60 लाख करोड़ रुपये बैठती है। इसके बावजूद कृषि अनुसंधान और विकास पर खर्च कृषि जीडीपी का महज 0.33 प्रतिशत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे कम से कम 1 प्रतिशत तक ले जाना जरूरी है, ताकि भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कृषि शक्ति बन सके। विकसित देशों में भले ही कृषि का जीडीपी में हिस्सा कम हो, लेकिन वे तकनीक, बीज और नवाचार पर भारत से कहीं अधिक निवेश करते हैं।

बजट के ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि अगर शिक्षा और शोध को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा की लड़ाई में भारतीय किसान अकेला पड़ सकता है। आत्मनिर्भरता का रास्ता केवल सब्सिडी से नहीं, बल्कि मजबूत रिसर्च, आधुनिक शिक्षा और प्रभावी क्रियान्वयन से होकर गुजरता है। बिना ज्ञान की खाद और बिना शोध के पानी के आत्मनिर्भरता की फसल कभी लहलहा नहीं सकती। अब जरूरत इस बात की है कि सरकार घोषणाओं से आगे बढ़कर जमीन पर निवेश और अमल की रणनीति अपनाए, क्योंकि भविष्य की खेती चुनावी वादों से नहीं, बल्कि आज किए गए शिक्षा और अनुसंधान के फैसलों से सुरक्षित होगी।

Asmita Sarkar

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