
नीट पीजी 2025 की काउंसलिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। National Board of Examinations in Medical Sciences (NBEMS) ने अदालत को बताया है कि क्वालीफाइंग कट ऑफ में कमी किए जाने के बाद 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए हैं। यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे के जरिए दी गई। मामला उन याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें परिणाम घोषित होने के बाद कट ऑफ में बदलाव को चुनौती दी गई है।
कट ऑफ घटने से बढ़ी पात्र उम्मीदवारों की संख्या
NBEMS के अनुसार संशोधित मानदंडों के तहत पात्रता पर्सेंटाइल में बड़ी कटौती की गई है। सामान्य वर्ग के लिए क्वालीफाइंग पर्सेंटाइल 50वें से घटाकर 7वां कर दिया गया है। अनारक्षित दिव्यांग श्रेणी के लिए इसे 5वां पर्सेंटाइल तय किया गया है, जबकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए पात्रता पर्सेंटाइल शून्य कर दिया गया है।
इन बदलावों के बाद ऐसे उम्मीदवार भी काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल हो सकते हैं, जिनके अंक 800 में से माइनस 40 तक हैं। NBEMS ने अदालत को बताया कि कट ऑफ कम होने से पात्र उम्मीदवारों की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है और अब 95,913 अतिरिक्त अभ्यर्थी काउंसलिंग में भाग ले सकेंगे। बोर्ड का कहना है कि इस स्तर पर किसी भी तरह का न्यायिक हस्तक्षेप हजारों छात्रों को प्रभावित कर सकता है, जो नए नियमों के तहत पात्र हुए हैं।
NBEMS की भूमिका क्या है?
अपने हलफनामे में NBEMS ने स्पष्ट किया है कि कट ऑफ कम करने का निर्णय उसका नहीं था। बोर्ड की भूमिका परीक्षा का आयोजन, मूल्यांकन और परिणाम तैयार कर संबंधित काउंसलिंग प्राधिकरण को सौंपने तक सीमित है। पात्रता पर्सेंटाइल में बदलाव का निर्णय Directorate General of Health Services (DGHS), Ministry of Health and Family Welfare और National Medical Commission (NMC) के अधिकार क्षेत्र में आता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने 9 जनवरी को तीसरे राउंड की काउंसलिंग के लिए संशोधित पर्सेंटाइल की सूचना NBEMS को भेजी थी। इसके बाद 13 जनवरी को संशोधित परिणाम जारी कर दिए गए और उन्हें मेडिकल काउंसलिंग कमेटी को सौंप दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?
रिपोर्ट के अनुसार शुरुआती काउंसलिंग राउंड के बाद देशभर में 18,000 से अधिक पीजी मेडिकल सीटें खाली रह गई थीं। सीटें भरने के उद्देश्य से पात्रता मानदंडों में ढील दी गई, ताकि ज्यादा उम्मीदवार काउंसलिंग में शामिल हो सकें।
हालांकि कुछ याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि परिणाम घोषित होने के बाद पात्रता नियमों में बदलाव करना चयन प्रक्रिया के बीच में नियम बदलने जैसा है। इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी को केंद्र सरकार, NBEMS, NMC और अन्य संबंधित प्राधिकरणों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
NBEMS ने अपने जवाब में Delhi High Court के एक फैसले का भी हवाला दिया है, जिसमें कहा गया था कि काउंसलिंग के लिए पर्सेंटाइल कम करने का अर्थ यह नहीं है कि सभी पात्र उम्मीदवारों को स्वतः प्रवेश मिल जाएगा। अंतिम सीट आवंटन अब भी मेरिट के आधार पर ही होगा।
अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर हैं। अदालत का फैसला यह तय करेगा कि परिणाम घोषित होने के बाद क्वालीफाइंग पर्सेंटाइल में बदलाव कानूनी रूप से कितना टिकाऊ है और क्या इससे राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित होती है।
नीट पीजी 2025 से जुड़े इस विवाद का असर हजारों मेडिकल अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में अदालत का रुख बेहद अहम माना जा रहा है।




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