
नीट-पीजी 2025 के क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में कमी के फैसले पर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। सरकार ने साफ कहा है कि नीट पीजी परीक्षा न्यूनतम क्लिनिकल क्षमता का परीक्षण नहीं करती, बल्कि यह सीमित स्नातकोत्तर (पीजी) सीटों के लिए मेरिट सूची तैयार करने का माध्यम है। किसी डॉक्टर की बुनियादी योग्यता उसकी एमबीबीएस डिग्री से पहले ही स्थापित हो जाती है।
केंद्र की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि सभी अभ्यर्थी लाइसेंस प्राप्त एमबीबीएस डॉक्टर हैं और स्वतंत्र रूप से चिकित्सा अभ्यास करने के पात्र हैं। इसलिए केवल नीट-पीजी स्कोर के आधार पर उनकी क्लिनिकल क्षमता पर सवाल उठाना उचित नहीं है।
‘नीट पीजी का उद्देश्य सीट आवंटन, न कि दक्षता प्रमाणन’
सरकार ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि नीट पीजी का स्कोर सापेक्ष प्रदर्शन और परीक्षा की संरचना पर आधारित होता है। इसका मकसद उपलब्ध सीटों के लिए उम्मीदवारों की रैंकिंग तय करना है। यह परीक्षा यह प्रमाणित नहीं करती कि कोई उम्मीदवार क्लिनिकल रूप से अयोग्य है।
सरकार के अनुसार, एमबीबीएस पूरा करने के बाद डॉक्टरों को पंजीकरण मिलता है और वे मरीजों का इलाज करने के लिए अधिकृत होते हैं। पीजी कोर्स विशेषज्ञता हासिल करने का अगला चरण है।
मरीज सुरक्षा को लेकर क्या कहा गया?
याचिकाओं में मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई थी। इस पर केंद्र ने इन आशंकाओं को “भ्रामक” बताया। हलफनामे में कहा गया कि पीजी प्रशिक्षण तीन वर्ष का संरचित कार्यक्रम होता है। इस दौरान डॉक्टर वरिष्ठ संकाय और विशेषज्ञों की निगरानी में काम करते हैं। अंतिम मूल्यांकन एमडी/एमएस की परीक्षा में होता है, जिसमें थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों में अलग-अलग न्यूनतम 50% अंक अनिवार्य हैं।
सरकार का कहना है कि अंतिम विशेषज्ञ डिग्री कड़े मूल्यांकन के बाद ही दी जाती है, इसलिए मरीज सुरक्षा से समझौते का सवाल नहीं उठता।
कितनी सीटें खाली थीं?
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और National Medical Commission के अनुसार, बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की आशंका को देखते हुए कटऑफ घटाने का फैसला लिया गया।
हलफनामे में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक शैक्षणिक सत्र 2025-26 में लगभग 70,000 पीजी सीटें उपलब्ध थीं। 2,24,029 अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी। ऑल इंडिया कोटा (AIQ) की 31,742 सीटों में से दूसरे राउंड के बाद 9,621 सीटें खाली रह गई थीं। इनमें से 5,213 सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों (AIQ और DNB सहित) में थीं।कटऑफ घटाने के बाद 1,00,054 अतिरिक्त उम्मीदवार तीसरे राउंड के लिए पात्र हुए। इससे कुल पात्र अभ्यर्थियों की संख्या बढ़कर 2,28,170 हो गई। तीसरे राउंड के बाद खाली सीटों की संख्या घटकर 2,988 रह गई।
सरकार का कहना है कि यदि समय पर कदम नहीं उठाया जाता तो बड़ी संख्या में सीटें खाली रह जातीं, जिससे प्रशिक्षण क्षमता और संसाधनों की बर्बादी होती।
पहले भी घटाया गया है पर्सेंटाइल
केंद्र ने अदालत को बताया कि 2017 में नीट-पीजी शुरू होने के बाद से विशेष परिस्थितियों में क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में कमी की जाती रही है। वर्ष 2023 में भी सभी श्रेणियों के लिए पर्सेंटाइल शून्य तक किया गया था, ताकि उपलब्ध सीटें खाली न रहें।
सरकार का तर्क है कि यह कदम असाधारण परिस्थितियों में लिया जाता है और इसका उद्देश्य केवल सीटों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना होता है।
‘यह नीतिगत फैसला, न्यायिक दखल सीमित’
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि पर्सेंटाइल घटाने का निर्णय एक नीतिगत मामला है। जब तक कोई फैसला स्पष्ट रूप से मनमाना या असंवैधानिक न हो, तब तक न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होता है।
हलफनामे में यह भी उल्लेख किया गया कि पीजी सीटों पर भारी सार्वजनिक निवेश होता है। सीटें खाली रहना न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि इससे विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता भी प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ सकता है।
अंत में सरकार ने कहा कि पर्सेंटाइल में कमी एक अनुपातिक प्रशासनिक कदम है, जिसका उद्देश्य सीटों की बर्बादी रोकना और विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता बढ़ाना है। सीट आवंटन अब भी मेरिट और उम्मीदवारों की पसंद के आधार पर ही होता है, इसलिए शैक्षणिक मानकों से कोई समझौता नहीं किया गया है।




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