
नागालैंड विश्वविद्यालय ने पूर्वोत्तर भारत और पूर्वी हिमालय की जैव विविधता पर एक महत्वपूर्ण शोध जारी किया है, जिसमें जंगली केले की प्रजाति मूसा सिक्कीमेंसिस पर विस्तृत अध्ययन शामिल है। ‘दार्जिलिंग केला’ या ‘सिक्किम केला’ के नाम से पहचानी जाने वाली यह प्रजाति न सिर्फ जलवायु परिवर्तन को सहने की क्षमता रखती है, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि के लिए भी बेहद उपयोगी मानी जा रही है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह बीज वाली जंगली प्रजाति कई तरह की बीमारियों से लड़ने में सक्षम है। गर्मी, ठंड और अन्य पर्यावरणीय दबावों को झेलने की क्षमता इसे केले की नई, अधिक टिकाऊ किस्में विकसित करने के लिए एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक स्रोत बनाती है। भले ही यह प्रजाति व्यावसायिक खेती में इस्तेमाल नहीं होती, लेकिन इसकी मजबूती लंबे समय में फसलों को स्थिर पैदावार देने में योगदान कर सकती है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि स्थानीय केले की कई किस्में विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में खुद को आसानी से ढाल लेती हैं। यह क्षमता उनके संरक्षण और भविष्य की प्रजनन तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट में स्थित नागालैंड लंबे समय से स्वदेशी केले की विविधता के लिए जाना जाता है, लेकिन वनों की कटाई और बढ़ती मानवीय दखल से कई जंगली प्रजातियाँ खत्म होने के कगार पर हैं।
‘भारत के नागालैंड में मूसा सिक्कीमेंसिस की स्थानीय प्रजातियों की आनुवंशिक विविधता की खोज’ शीर्षक से प्रकाशित यह शोध, लुप्तप्राय केले के जर्मप्लाज्म संरक्षण की तात्कालिक आवश्यकता पर जोर देता है। यह अध्ययन एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ है जो पादप और पशु जीव विज्ञान, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित है।
इस शोध में नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधार्थी केआर सिंह, डॉ. एस वॉलिंग और डॉ. अनिमेष सरकार शामिल हैं। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश के. पटनायक ने इसे एक बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि टीम ने संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए एक ‘जैव विविधता गलियारा’ तैयार किया है। उनके अनुसार, यह पहल न सिर्फ पूर्वोत्तर भारत की प्राकृतिक संपदा को सुरक्षित करेगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में पौधों की आनुवंशिक मजबूती को भी सुनिश्चित करेगी।
यह अध्ययन डॉ. अनिमेष सरकार के निर्देशन में चल रही पीएचडी और स्नातकोत्तर परियोजनाओं का हिस्सा है, जिसमें राज्य भर में केले की विविधता का दस्तावेजीकरण, जर्मप्लाज्म का नक्शा बनाना, जंगली प्रजातियों की पहचान और उनके आनुवंशिक मूल्यांकन का कार्य शामिल है।
शोध के दौरान टीम को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा—दुर्गम इलाके, जंगलों तक सीमित पहुंच और किसानों में पारंपरिक किस्मों के संरक्षण के प्रति कम जागरूकता। डॉ. सरकार के अनुसार, हाइब्रिड और टिश्यू कल्चर से तैयार पौधों पर बढ़ती निर्भरता के कारण पारंपरिक व जंगली प्रजातियाँ धीरे-धीरे गायब हो रही हैं। यही वजह है कि इन दुर्लभ पौधों के संरक्षण और उपयोग दोनों पर ध्यान देने की जरूरत है।
अध्ययन ने यह भी संकेत दिया कि जंगली केले की किस्में भविष्य में ज्यादा उपज देने वाली और रोग-प्रतिरोधी किस्में विकसित करने का आधार बन सकती हैं। इनके उपयोग से रेशा आधारित उत्पादों से लेकर स्वास्थ्यवर्धक पेय तक नए उत्पादों के विकास की भी संभावनाएँ हैं।
नागालैंड के आदिवासी समुदायों में जंगली केले का उपयोग सदियों से भोजन, रेशा, औषधि और सांस्कृतिक परंपराओं में होता आया है। इन पौधों में पेचिश, अल्सर, मधुमेह और संक्रमणों से लड़ने वाले गुण भी पाए गए हैं।
संरक्षण को मजबूत करने के लिए नागालैंड विश्वविद्यालय ने अपने बागवानी विभाग में ‘केला जैव विविधता गलियारा’ स्थापित किया है। यह एक जीवित फील्ड जीन बैंक की तरह काम करता है और इन-सीटू व एक्स-सीटू संरक्षण दोनों को जोड़ते हुए आनुवंशिक शोध, जलवायु-लचीले प्रजनन कार्यक्रम, छात्र प्रशिक्षण और राष्ट्रीय जर्मप्लाज्म संरक्षण अभियानों को समर्थन देता है।
पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध जैव विविधता तेजी से बदलते मौसम और मानवीय गतिविधियों के बीच पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हो चुकी है। ऐसे समय में नागालैंड विश्वविद्यालय का यह शोध न सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि क्षेत्र की प्राकृतिक धरोहर को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी माना जा रहा है।




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