
दुनिया भर में बच्चों और किशोरों में सोशल मीडिया की बढ़ती लत को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। कई विशेषज्ञ अब इसे युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए उतना ही खतरनाक मानने लगे हैं जितना कभी सिगरेट को माना जाता था। यही वजह है कि डिजिटल सुरक्षा को लेकर कई देशों में कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के बाद अब भारत में भी नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया की पहुंच सीमित करने की चर्चा तेज हो गई है। कुछ राज्य सरकारें इस दिशा में ठोस फैसले लेने की तैयारी में हैं, जबकि बड़ी टेक कंपनियां इन पाबंदियों को रोकने के लिए जोरदार लॉबिंग कर रही हैं।
भारत में भी अब बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर बहस तेज होती दिखाई दे रही है। हाल के महीनों में कुछ राज्यों ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर सख्त रुख अपनाया है। कर्नाटक सरकार ने घोषणा की है कि 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य के बजट भाषण में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि बच्चों में डिजिटल लत एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है। इसी तरह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी संकेत दिया है कि आने वाले महीनों में नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस को सीमित करने के उपाय लागू किए जा सकते हैं। राज्य सरकारों का मानना है कि लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चों की पढ़ाई, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
केंद्र सरकार भी इस विषय को गंभीरता से देख रही है। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में कहा कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है और इस विषय पर तकनीकी कंपनियों के साथ बातचीत चल रही है। सरकार उम्र आधारित एक्सेस कंट्रोल यानी आयु के आधार पर सोशल मीडिया तक पहुंच सीमित करने की संभावना पर विचार कर रही है। इसके अलावा डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून में भी बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कई प्रावधान जोड़े गए हैं, जिनका उद्देश्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को ज्यादा जिम्मेदार बनाना है। आर्थिक सर्वेक्षण में भी सोशल मीडिया की लत को लेकर चिंता जताई गई है और उम्र के अनुसार सीमाएं तय करने की सिफारिश की गई है।
दरअसल, यह बहस सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों ने इस मुद्दे पर पहले ही सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 से 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए कई बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लागू करने का फैसला किया है। नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया है। यूरोप में भी इसी तरह की पहल देखने को मिल रही है। फ्रांस की नेशनल असेंबली ने 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध से जुड़ा विधेयक पास किया है। स्पेन, ग्रीस और पोलैंड जैसे देश भी नाबालिगों की डिजिटल पहुंच सीमित करने के लिए नए कानून तैयार कर रहे हैं।
ब्रिटेन में भी यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस का बड़ा विषय बन गया है। वहां कई पेरेंटिंग समूहों ने सोशल मीडिया को बच्चों के लिए ‘सिगरेट जैसा खतरा’ बताते हुए सख्त नियमों की मांग की है। इस बढ़ते दबाव के बीच ब्रिटिश सरकार भी बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करने वाले नए नियमों पर विचार कर रही है। स्पेन में तो सरकार एक ऐसा कानून लाने की तैयारी में है जिसमें हानिकारक कंटेंट के लिए टेक कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा।
दूसरी ओर, डिजिटल कंपनियों के लिए यह बदलता नियामक माहौल एक बड़ी चुनौती बन गया है। सोशल मीडिया कंपनियों का बिजनेस मॉडल काफी हद तक ‘अटेंशन इकोनॉमी’ पर आधारित है, यानी जितना ज्यादा समय लोग प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं, उतना ज्यादा उनका कारोबार बढ़ता है। ऐसे में अगर किशोरों के लिए प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगते हैं तो इसका सीधा असर कंपनियों के यूजर बेस और विज्ञापन आय पर पड़ सकता है।
इसी वजह से बड़ी टेक कंपनियां इन प्रस्तावित प्रतिबंधों के खिलाफ सक्रिय लॉबिंग कर रही हैं। यूरोपीय संघ में राजनीतिक स्तर पर प्रभाव बनाने के लिए पिछले वर्ष टेक कंपनियों ने बड़ी रकम खर्च की। कंपनियों का तर्क है कि पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय माता-पिता को ज्यादा नियंत्रण देना बेहतर विकल्प हो सकता है। इसी रणनीति के तहत कई प्लेटफॉर्म्स किशोरों के लिए अलग प्रकार के अकाउंट या विशेष सुरक्षा फीचर पेश कर रहे हैं, ताकि सरकारों को यह भरोसा दिलाया जा सके कि वे खुद ही सुरक्षा उपाय लागू कर सकते हैं।
हालांकि कई सरकारों का मानना है कि केवल कंपनियों की ‘सेल्फ रेगुलेशन’ व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। उनका तर्क है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा और कड़े नियम जरूरी हैं। इसलिए आने वाले वर्षों में एज वेरिफिकेशन तकनीक, एल्गोरिदम की पारदर्शिता और कंटेंट मॉडरेशन जैसे मुद्दों पर वैश्विक स्तर पर सख्त नियम देखने को मिल सकते हैं।
स्पष्ट है कि डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा अब एक बड़ा वैश्विक नीति प्रश्न बन चुका है। भारत सहित कई देश इस बात पर विचार कर रहे हैं कि तकनीक के लाभ और बच्चों की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले समय में यह तय करेगा कि अगली पीढ़ी का डिजिटल अनुभव कितना सुरक्षित और संतुलित होगा।




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