
भारत में डॉक्टर बनने का सपना लाखों छात्रों का होता है। हर साल मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG के लिए 20 लाख से अधिक छात्र आवेदन करते हैं। समाज में लंबे समय से यह धारणा भी रही है कि डॉक्टर अक्सर अपने बच्चों को भी इसी पेशे में लाना चाहते हैं। लेकिन हाल में सामने आए एक सर्वे ने इस धारणा से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश की है।
मुंबई स्थित Debrata Mitali Aro Foundation (DAF) द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक भारत में करीब 91 प्रतिशत डॉक्टर ऐसे हैं जो नहीं चाहते कि उनके बच्चे मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाएं। यह सर्वे छह महीने से अधिक समय तक किया गया और इसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से डॉक्टरों की राय ली गई।
छोटे शहरों से मेट्रो तक डॉक्टरों से बातचीत
फाउंडेशन के अनुसार इस सर्वे में 1200 से अधिक चिकित्सकों को शामिल किया गया। इनमें सरकारी और निजी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर शामिल थे। जनरल मेडिसिन, सर्जरी, पीडियाट्रिक्स और गायनेकोलॉजी जैसे अलग-अलग विभागों के डॉक्टरों से बातचीत कर उनकी राय दर्ज की गई।
सर्वे के नतीजों में चार ऐसी प्रमुख चुनौतियां सामने आईं, जिनसे डॉक्टर सबसे ज्यादा परेशान महसूस करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यही वजहें हैं जिनके कारण कई डॉक्टर अपने बच्चों को इस पेशे में आने से रोकना चाहते हैं।
डॉक्टरों पर बढ़ती हिंसा की चिंता
सर्वे में शामिल 84 प्रतिशत डॉक्टरों ने मरीजों या उनके परिजनों द्वारा हिंसा की आशंका को सबसे बड़ी चिंता बताया। अस्पतालों में डॉक्टर और मरीज के परिजनों के बीच विवाद, गाली-गलौज और कई बार मारपीट की घटनाएं सामने आती रहती हैं। खासकर इमरजेंसी या गंभीर मामलों में ऐसी घटनाओं की खबरें अक्सर आती हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि यह समस्या किसी एक अस्पताल या शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई हिस्सों में देखने को मिल रही है। यही वजह है कि कई डॉक्टर अपने बच्चों के लिए इस पेशे को सुरक्षित विकल्प नहीं मानते।
लंबे काम के घंटे और बढ़ता बर्नआउट
मेडिकल पेशे की दूसरी बड़ी चुनौती अत्यधिक काम का दबाव है। डॉक्टरों को अक्सर 10 से 12 घंटे या उससे अधिक समय तक काम करना पड़ता है। नाइट शिफ्ट, इमरजेंसी कॉल और लगातार मरीजों की जिम्मेदारी के कारण निजी जीवन के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है।
सर्वे में करीब 78 प्रतिशत डॉक्टरों ने माना कि पिछले एक साल में उन्होंने अत्यधिक मानसिक और शारीरिक थकान यानी बर्नआउट महसूस किया। उनका कहना है कि लगातार काम के दबाव के कारण परिवार के साथ समय बिताना भी कठिन हो जाता है।
कानूनी मामलों का डर भी बड़ी वजह
मेडिकल पेशा जिम्मेदारी से जुड़ा होता है और डॉक्टरों के फैसले सीधे मरीज की जिंदगी को प्रभावित करते हैं। इसी कारण इस क्षेत्र में कई नियम और कानूनी प्रक्रियाएं भी जुड़ी होती हैं।
सर्वे में शामिल डॉक्टरों ने बताया कि कई बार मामूली मामलों में भी कानूनी विवाद का डर बना रहता है। इसी वजह से कई चिकित्सक अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए मरीजों को ज्यादा जांच कराने की सलाह देते हैं, ताकि इलाज में किसी तरह की गलती की गुंजाइश न रहे।
मेहनत के बावजूद घटता भरोसा
डॉक्टरों की एक और बड़ी चिंता समाज में उनके प्रति बदलती धारणा को लेकर सामने आई। सर्वे के मुताबिक हर दस में से लगभग छह डॉक्टरों को लगता है कि लोगों का भरोसा पहले की तुलना में कम हुआ है।
मेडिकल की पढ़ाई लंबी और कठिन होती है। इसके बाद भी कई डॉक्टरों को लगता है कि उनके काम और त्याग को उतनी सामाजिक मान्यता नहीं मिलती, जितनी मिलनी चाहिए। यही भावना भी कई डॉक्टरों को अपने बच्चों को इस पेशे में आने के लिए प्रेरित करने से रोकती है।
वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ रही
डॉक्टरों में बढ़ते तनाव और मानसिक दबाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई गई है। मेडिकल जर्नल JAMA में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में डॉक्टरों में अवसाद की दर लगभग 29 प्रतिशत तक पाई गई है।
हालांकि भारत में स्थिति अधिक गंभीर बताई जा रही है। DAF सर्वे के अनुसार देश में डॉक्टरों के बीच बर्नआउट और मानसिक दबाव का स्तर 78 प्रतिशत तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार, डॉक्टरों की सुरक्षा और बेहतर कार्य परिस्थितियां इस समस्या को कम करने में मदद कर सकती हैं।
मेडिकल पेशे पर नई बहस
यह सर्वे ऐसे समय में सामने आया है जब देश में मेडिकल शिक्षा को लेकर छात्रों की रुचि लगातार बढ़ रही है। हर साल लाखों छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
लेकिन डॉक्टरों की ओर से सामने आई यह राय स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कई सवाल भी उठाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डॉक्टरों की कार्य परिस्थितियों, सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में यह समस्या और बढ़ सकती है।




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