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एआई मददगार है, लेकिन जज या वकील की जगह नहीं ले सकता: जस्टिस विक्रम नाथ

एआई मददगार है, लेकिन जज या वकील की जगह नहीं ले सकता: जस्टिस विक्रम नाथ

कानूनी व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते उपयोग को लेकर Vikram Nath ने अहम टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि अगर एआई का समझदारी से इस्तेमाल किया जाए तो यह न्यायिक कामकाज को सरल बना सकता है और समय बचाने में मदद कर सकता है। लेकिन यह किसी भी स्थिति में वकीलों की कानूनी समझ, अदालत के अधिकारियों की नैतिक जिम्मेदारी या न्यायाधीश के संतुलित फैसले की जगह नहीं ले सकता।

एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक को केवल एक उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार एआई नोट तैयार करने, दस्तावेजों का मसौदा बनाने या जानकारी खोजने में सहायक हो सकता है, लेकिन उसे कानून की व्याख्या करने या नए कानूनी सिद्धांत गढ़ने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

बिना जांच के एआई सामग्री पेश करना खतरनाक

जस्टिस नाथ ने हाल के कुछ मामलों का उल्लेख करते हुए चिंता जताई कि कई बार एआई से तैयार सामग्री को बिना जांचे-परखे अदालत में पेश कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि Supreme Court of India में भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां वकीलों ने ऐसी कानूनी मिसालों और फैसलों का हवाला दिया जो वास्तव में मौजूद ही नहीं थे।

उनके अनुसार, गलत या काल्पनिक कानूनी संदर्भ देना केवल तकनीकी गलती नहीं है, बल्कि इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और अदालत की गरिमा पर भी असर पड़ता है।

एआई का गलत इस्तेमाल चिंता का विषय

उन्होंने कहा कि एआई का दुरुपयोग एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि न्यायिक व्यवस्था तकनीक से दूरी बना ले। सही रास्ता यह है कि एआई का इस्तेमाल जिम्मेदारी, नैतिकता और पेशेवर मानकों के साथ किया जाए।

जस्टिस नाथ ने कहा कि लोगों को इन तकनीकी उपकरणों का उपयोग करते समय उनकी सीमाओं को भी समझना होगा। एआई कई तरह की सुविधाएं देता है, जिससे न्याय तक लोगों की पहुंच बढ़ सकती है और कामकाज में पारदर्शिता भी आ सकती है। लेकिन इसके साथ यह जोखिम भी है कि गलत जानकारी या तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तथ्य न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।

तकनीक के फायदे और खतरे दोनों

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिक तकनीकें एक तरफ अपराध से निपटने और जांच को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन दूसरी ओर इन्हीं तकनीकों का इस्तेमाल नए प्रकार के अपराध करने के लिए भी किया जा सकता है।

जस्टिस नाथ के अनुसार, इस चुनौती से निपटने के लिए संस्थाओं को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। तकनीक को केवल इसलिए खारिज नहीं करना चाहिए कि वह नई है, और न ही केवल सुविधा के कारण उसे बिना सोचे-समझे स्वीकार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अंततः कानून का शासन इस बात पर निर्भर करता है कि संस्थाएं कितनी मजबूत हैं और उनमें काम करने वाले लोग कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।

इस कार्यक्रम में Satish Chandra Sharma और Aparesh Kumar Singh ने भी न्याय व्यवस्था में तकनीक की भूमिका पर अपने विचार साझा किए।

Asmita Sarkar

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