
भारत में उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ने के बावजूद स्नातक युवाओं में बेरोज़गारी की समस्या बनी हुई है। Azim Premji University द्वारा जारी स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग के करीब 40 प्रतिशत और 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 20 प्रतिशत युवा नौकरी नहीं पा रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 से 29 वर्ष के युवाओं के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि, 2030 के बाद कामकाजी आयु वर्ग की आबादी घटने लगेगी। ऐसे में उत्पादक और पर्याप्त रोजगार सृजन के लिए समय सीमित है। आने वाले वर्षों में नौकरी सृजन की रफ्तार ही तय करेगी कि जनसांख्यिकीय लाभ आर्थिक लाभ में बदल पाएगा या नहीं।
रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि शिक्षित युवाओं की बढ़ती संख्या और गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की उपलब्धता के बीच संरचनात्मक असंतुलन मौजूद है। भारत की आर्थिक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि इन युवाओं को श्रम बाजार में कितनी प्रभावी तरीके से समाहित किया जाता है।
रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका और अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर रोज़ा अब्राहम ने बताया कि 20–24 आयु वर्ग में रोजगार बढ़ा है, लेकिन इसका एक कारण शिक्षा में भागीदारी का घटना भी है। उनके अनुसार, इस आयु वर्ग में रोजगार बढ़ोतरी केवल स्नातकों तक सीमित नहीं, बल्कि गैर-स्नातक युवा भी इसमें शामिल हैं।
शिक्षा में प्रगति, लेकिन कई कमियां बरकरार
पिछले चार दशकों में युवाओं की शैक्षणिक उपलब्धियों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, खासकर महिलाओं के बीच। भारत में उच्च शिक्षा में नामांकन दर 28 प्रतिशत है, जो समान आय वाले देशों के बराबर है। हालांकि पुरुषों की भागीदारी में गिरावट दर्ज की गई है। 2017 में 38 प्रतिशत पुरुष नामांकित थे, जो 2024 के अंत तक घटकर 34 प्रतिशत रह गए। इसका एक कारण यह है कि अधिक युवा पुरुष परिवार की आय बढ़ाने के लिए जल्दी काम में लग रहे हैं।
उच्च शिक्षा संस्थानों का ढांचा भी बढ़ा है। 2010 में प्रति एक लाख युवाओं पर 29 कॉलेज उपलब्ध थे, जो 2021 तक बढ़कर 45 हो गए। इस विस्तार में निजी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही, हालांकि क्षेत्रीय असमानताएं अब भी मौजूद हैं।
फैकल्टी की कमी भी एक बड़ी समस्या है। All India Council for Technical Education (AICTE) के मानकों के अनुसार एक शिक्षक पर 15–20 छात्रों का अनुपात होना चाहिए। लेकिन निजी कॉलेजों में औसतन 28 और सरकारी कॉलेजों में 47 छात्र प्रति शिक्षक हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) की संख्या 2010 के बाद करीब 300 प्रतिशत बढ़ी है, लेकिन खासकर निजी संस्थानों में गुणवत्ता कमजोर हुई है।
निम्न आय वर्ग के छात्रों की पहुंच बढ़ी है। सबसे गरीब परिवारों से आने वाले छात्रों की हिस्सेदारी 2007 में 8 प्रतिशत थी, जो 2017 में बढ़कर 15 प्रतिशत हो गई। फिर भी इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे पेशेवर कोर्स की ऊंची फीस बड़ी बाधा बनी हुई है, क्योंकि इनकी लागत अक्सर गरीब परिवारों के सालाना खर्च से ज्यादा होती है।
वेतन बढ़त के बावजूद नौकरियों की कमी
रिपोर्ट बताती है कि श्रम बाजार में युवाओं के लिए स्थिर नौकरी के अवसर सीमित हैं। पढ़ाई पूरी करने के एक साल के भीतर बहुत कम स्नातकों को स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है। हालांकि शुरुआती स्तर पर स्नातक युवाओं की कमाई गैर-स्नातकों से लगभग दोगुनी है, जो उच्च वेतन का संकेत है। इसके बावजूद आय वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ी है। 2011 के बाद युवा पुरुष स्नातकों के शुरुआती वेतन में ठहराव देखा गया है, जो कुशल श्रमिकों की मांग में कमी की ओर इशारा करता है। हालांकि लैंगिक वेतन अंतर कुछ कम हुआ है।
अमित बसोले ने कहा कि कंपनियां पहले से प्रशिक्षित कर्मचारियों को प्राथमिकता देती हैं, क्योंकि प्रशिक्षण महंगा होता है। इससे कौशल विकास में कमी आती है। उन्होंने बताया कि यह चुनौती खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र में ज्यादा गंभीर है, जहां अधिकांश शुरुआती नौकरियां पैदा होती हैं। छोटे उद्योगों को कर्मचारियों को नियुक्त करने और प्रशिक्षित करने में सक्षम बनाना जरूरी है। साथ ही अप्रेंटिसशिप व्यवस्था और प्रशिक्षण संस्थानों का उद्योग से जुड़ाव भी कमजोर है।
रिपोर्ट में नौकरी की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता जताई गई है। World Bank की श्रायना भट्टाचार्य के अनुसार कई युवा, खासकर पुरुष, मौजूदा रोजगार ढांचे से संतुष्ट नहीं हैं। प्रतिस्पर्धा, नौकरी की गुणवत्ता, सम्मान और उद्देश्य की कमी जैसे कारणों से वे काम से दूरी बना रहे हैं।
रोजगार के स्वरूप में बदलाव, पर गुणवत्ता की चुनौती कायम
रिपोर्ट में बताया गया है कि कृषि क्षेत्र से श्रमिकों का पलायन जारी है। युवा कामगार, बुजुर्गों की तुलना में तेज़ी से विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। युवा महिलाओं की भागीदारी आईटी, ऑटोमोबाइल निर्माण और बिजनेस सेवाओं में बढ़ी है, जो रोजगार के अवसरों के विविधीकरण को दिखाता है।
युवा पीढ़ी में जाति और लिंग आधारित पेशागत भेदभाव में भी धीरे-धीरे कमी आई है, जो सकारात्मक सामाजिक बदलाव का संकेत है।
प्रवास रोजगार संतुलन का अहम साधन बनकर उभरा है। अपेक्षाकृत गरीब और युवा आबादी वाले राज्य श्रम आपूर्ति के प्रमुख स्रोत हैं, जबकि समृद्ध और उम्रदराज आबादी वाले राज्य प्रवासी युवाओं पर निर्भर होते जा रहे हैं। हालांकि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की पोर्टेबिलिटी कमजोर होने से श्रमिकों की आवाजाही सीमित होती है।
रिपोर्ट ने जोर दिया है कि भारत की जनसांख्यिकीय बढ़त अपने चरम के करीब है। ऐसे में नीतियों का फोकस सिर्फ शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने पर नहीं, बल्कि रोजगार की गुणवत्ता सुधारने, कौशल और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल बनाने और नौकरी मिलान प्रक्रिया को मजबूत करने पर होना चाहिए। अगर इन संरचनात्मक चुनौतियों को दूर नहीं किया गया, तो जनसांख्यिकीय लाभ आर्थिक अवसर में बदलने से चूक सकता है।




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