
- P. Radhakrishnan रतन टाटा महाराष्ट्र स्टेट स्किल्स यूनिवर्सिटी के पहले दीक्षांत समारोह में शामिल हुए, जहां उन्होंने बदलती दुनिया में शिक्षा की भूमिका पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उपराष्ट्रपति ने कहा कि विश्वविद्यालयों को ऐसा पाठ्यक्रम विकसित करना चाहिए जो आधुनिक, वैज्ञानिक हो और छात्रों को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार कर सके।
अपने संबोधन में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज के समय में केवल तकनीकी ज्ञान (हार्ड स्किल्स) पर्याप्त नहीं है। संवाद कौशल, टीमवर्क, भावनात्मक समझ और विशेष रूप से एडाप्टेबिलिटी जैसी सॉफ्ट स्किल्स भविष्य के नेताओं को पहचान देती हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग समय और परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने की क्षमता रखते हैं, वही तेजी से आगे बढ़ते हैं।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि किसी भी देश की असली ताकत उसके लोगों की क्षमता में होती है। जब नागरिक सक्षम और कुशल होते हैं, तो देश विकास की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ता है। उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि समाज में हो रहे सकारात्मक कार्यों से सीख लेकर उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।
उन्होंने अपने राज्यपाल कार्यकाल का अनुभव साझा करते हुए कहा कि शिक्षा का सीधा संबंध रोजगार से होना चाहिए। डिग्री तभी मायने रखती है जब वह रोजगार के अवसर खोले। इसलिए स्किल डेवलपमेंट, नई तकनीकों और व्यावहारिक प्रशिक्षण पर ज्यादा जोर देना समय की मांग है।
अपने संदेश में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में हुए सुधारों का भी उल्लेख किया। स्किल इंडिया, PM-SETU, स्किल इंडिया डिजिटल हब और कौशल विकास व उद्यमिता मंत्रालय की पहलें युवाओं को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने का काम कर रही हैं।
उन्होंने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री Devendra Fadnavis की सोच की प्रशंसा करते हुए कहा कि राज्य आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ कदम मिलाकर चल रहा है। यह बदलाव सरकार की नीतियों, योजनाओं और बेहतर क्रियान्वयन का परिणाम है।
भारत की युवा आबादी को लेकर उन्होंने कहा कि यदि युवाओं को सही दिशा और प्रशिक्षण मिले, तो यही जनसंख्या देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। लेकिन यदि स्किल्स की कमी रही, तो यही आबादी चुनौती भी बन सकती है। उन्होंने छात्रों से कहा कि वे जहां भी काम करें, अपने प्रोफेशनल रवैये और मेहनत से भारत की वैश्विक छवि को मजबूत बनाएं।
रतन टाटा की विरासत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस यूनिवर्सिटी की जिम्मेदारी है कि वह शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम करे। संस्थान को ऐसे युवाओं को तैयार करना चाहिए जो उद्योग की जरूरतों के अनुरूप हों और समाज के प्रति जिम्मेदार भी।
अपने संबोधन के अंत में उपराष्ट्रपति ने कहा कि उद्योगों को विकास के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। उनका मानना है कि यही सोच एक आदर्श नेता को गढ़ती है और देश को आगे बढ़ाती है।




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