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खून पतला करने वाली दवाओं पर नया अध्ययन: हर तीसरे मरीज में एस्पिरिन और क्लोपिडोग्रेल बेअसर

खून पतला करने वाली दवाओं पर नया अध्ययन: हर तीसरे मरीज में एस्पिरिन और क्लोपिडोग्रेल बेअसर

खून पतला करने वाली दवाओं पर नया अध्ययन: हर तीसरे मरीज में एस्पिरिन और क्लोपिडोग्रेल बेअसर

खून पतला करने वाली दवाओं पर AIIMS के डॉक्टरों द्वारा किया गया एक नया अध्ययन चिंता बढ़ाने वाला है। लंबे समय से भरोसेमंद मानी जाने वाली एस्पिरिन और क्लोपिडोग्रेल कई मरीजों में उम्मीद के अनुसार असर नहीं दिखा रहीं। शोध के मुताबिक, दिल और धमनियों की बीमारी (सीएडी) से पीड़ित हर तीसरे मरीज में ये दवाएं या तो पूरी तरह बेअसर थीं या आंशिक रूप से ही काम कर रही थीं।

अध्ययन में 151 मरीजों को शामिल किया गया। जांच से सामने आया कि एस्पिरिन करीब 30% मरीजों में प्रभावी नहीं रही, जबकि क्लोपिडोग्रेल का असर इससे भी कम पाया गया। इन परिणामों को पाने के लिए प्लेटलेट एग्रेशन टेस्ट का इस्तेमाल किया गया, जिससे यह समझा जा सके कि दवाएं खून को थक्का बनने से रोकने में कितनी प्रभावी हैं।

एक और अहम तथ्य यह सामने आया कि मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित मरीजों में दवाओं के प्रति प्रतिरोध ज्यादा पाया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर खून पतला करने वाली दवाएं पूरी तरह काम न करें, तो हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। अध्ययन के दौरान कुछ मरीजों में दोबारा दिल का दौरा भी देखा गया और कुछ मौतें भी हुईं, हालांकि शोधकर्ता इसे दवाओं के असर से सीधे जोड़ने के लिए और अध्ययन की जरूरत बता रहे हैं।

अध्ययन से जुड़े Dr. Nirmal Ghati का कहना है कि अब उपचार की वर्तमान रणनीति पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, “वन-साइज-फिट्स-ऑल” यानी सभी को एक जैसी दवा देने का तरीका आगे कारगर नहीं रहेगा। भविष्य में मरीज की सेहत, बीमारी की गंभीरता और शरीर की प्रतिक्रिया के आधार पर दवा और उसकी मात्रा तय करनी पड़ सकती है।

यह शोध दिल की बीमारियों के इलाज में व्यक्तिगत चिकित्सा (पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट) की बढ़ती जरूरत की ओर इशारा करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर शुरुआती चरण में ही दवा के प्रभाव का आकलन कर लिया जाए, तो मरीजों के लिए उपचार को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाया जा सकता है।

Asmita Sarkar

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