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भारत में समुद्री शैवाल की पहचान अब होगी और सटीक, वैज्ञानिकों ने तैयार की डीएनए आधारित विश्वसनीय सूची

भारत में समुद्री शैवाल की पहचान अब होगी और सटीक, वैज्ञानिकों ने तैयार की डीएनए आधारित विश्वसनीय सूची

भारत में समुद्री शैवाल की पहचान अब होगी और सटीक, वैज्ञानिकों ने तैयार की डीएनए आधारित विश्वसनीय सूची

समुद्र की गहराइयों में मिलने वाले समुद्री शैवाल—जिन्हें मैक्रोएल्गी कहा जाता है—समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की बुनियाद माने जाते हैं। ये शैवाल असंख्य समुद्री जीवों को भोजन और आश्रय प्रदान करते हैं, समुद्र को संतुलित रखते हैं और औद्योगिक उपयोग में भी अब इनकी भूमिका तेजी से बढ़ रही है। कई शैवाल दवाओं, खाद्य उद्योग और बायो-प्रोडक्ट्स के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं। भारत का विशाल समुद्री तट इन्हीं विविध शैवाल प्रजातियों का घर है।

लेकिन समुद्री शैवाल की पहचान करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। उनका रंग, आकार और बनावट वातावरण, उम्र और प्रजनन अवस्था के अनुसार बदलता रहता है। पारंपरिक तरीकों से केवल आकृति देखकर पहचान करने में अक्सर गलतियां हो जाती हैं। वैज्ञानिक लंबे समय से इस समस्या का समाधान तलाश रहे थे, और इसी कड़ी में आधुनिक तकनीक डीएनए बारकोडिंग एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभर कर सामने आई है।

डीएनए बारकोडिंग में किसी जीव के डीएनए का एक छोटा, मानक हिस्सा पढ़कर उसकी सही प्रजाति का पता लगाया जाता है। समुद्री शैवाल के मामले में rbcL और ITS जैसे जीन सबसे प्रभावी माने जाते हैं। इस तकनीक की खासियत यह है कि पहचान शैवाल के आकार या रूप पर निर्भर नहीं होती—इसलिए यह पारंपरिक विधियों की तुलना में अधिक सटीक और वैज्ञानिक है। यह शोध जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा में प्रकाशित हुआ है।

भारत में डीएनए बारकोडिंग की स्थिति पता लगाने के लिए व्यापक डिजिटल अध्ययन

सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (CSIR-CSMCRI) और एकेडमी ऑफ साइंटिफिक एंड इनोवेटिव रिसर्च (AcSIR) के वैज्ञानिकों ने भारत में समुद्री शैवाल के डीएनए डेटा का डिजिटल आकलन किया। उन्होंने ग्रीन, रेड और ब्राउन शैवाल प्रजातियों के डीएनए अनुक्रम अंतरराष्ट्रीय GenBank डेटाबेस से इकट्ठे किए और फिर Web of Science, Scopus और PubMed जैसे प्रमुख शोध डेटाबेस से उनकी तुलना की। गलत या डुप्लिकेट जानकारी हटाने के बाद शोधकर्ताओं ने 207 उच्च गुणवत्ता वाले और अनूठे डीएनए अनुक्रमों का एक विश्वसनीय डेटा सेट तैयार किया।

अध्ययन में यह भी उजागर हुआ कि भारत में शैवाल की कुल विविधता का केवल 11 प्रतिशत हिस्सा ही डीएनए आधारित रूप से दर्ज हुआ है। साथ ही, शोध का झुकाव उन प्रजातियों पर अधिक देखा गया जो आर्थिक रूप से उपयोगी हैं, जबकि पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण कई प्रजातियां अभी भी अधूरी सूची का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को समुद्री शैवाल के लिए एक व्यापक और गुणवत्ता-संपन्न डीएनए बारकोड लाइब्रेरी तैयार करने की जरूरत है।

डीएनए बारकोडिंग क्यों है जरूरी?

यह तकनीक समुद्री शैवाल की वैज्ञानिक पहचान को न केवल तेज बल्कि बेहद सटीक बनाती है। इससे गलत पहचान के कारण फसल हानि या आर्थिक नुकसान को रोका जा सकता है।

साथ ही, यह तकनीक हानिकारक शैवाल के अचानक बढ़ने और आक्रामक प्रजातियों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है—जो तटीय सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिए जरूरी है।

डीएनए बारकोडिंग नई प्रजातियों की खोज में भी मदद करती है, जिससे भारत की समुद्री जैव विविधता के वैज्ञानिक अध्ययन को मजबूती मिलती है।

वर्तमान में भारत में DBIndAlgae जैसे डेटाबेस मौजूद हैं, जो शैवाल की सूची तो प्रदान करते हैं, लेकिन उनमें डीएनए आधारित डेटा की गुणवत्ता और पूर्णता सुनिश्चित नहीं होती। नया अध्ययन पहली बार देश के समुद्री शैवाल के लिए एक विश्वसनीय, वैज्ञानिक और एकीकृत डीएनए बारकोड सूची पेश करता है—जो दशकों से बिखरे पड़े रिकॉर्ड्स को एक सुव्यवस्थित इन्वेंटरी में बदलती है।

भारत की समुद्री जैव विविधता को समझने और संरक्षित करने के लिए यह अध्ययन महत्वपूर्ण कदम है। डीएनए बारकोडिंग पर अधिक ध्यान देने से न केवल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा, बल्कि समुद्री कृषि, दवा उद्योग और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगे।

Asmita Sarkar

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