
झारखंड स्थित Birla Institute of Technology Mesra के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) सिस्टम विकसित किया है, जो दिमाग के संकेतों को रियल-टाइम कमांड में बदलकर व्हीलचेयर को नियंत्रित कर सकता है। यह तकनीक खासतौर पर उन लोगों के लिए तैयार की गई है, जिन्हें रीढ़ की हड्डी की चोट, स्ट्रोक या अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारण चलने-फिरने में दिक्कत होती है।
यह सिस्टम इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफी (EEG) सिग्नल का उपयोग करता है, जिससे बिना किसी सर्जरी के दिमाग की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया जा सकता है। इसी डेटा के आधार पर व्हीलचेयर को दिशा और गति से जुड़े निर्देश दिए जाते हैं, जिससे उपयोगकर्ता सिर्फ अपने विचारों के जरिए इसे नियंत्रित कर सकता है।
इस तकनीक की खास बात इसका हाइब्रिड मॉडल है, जिसमें डीप लर्निंग की कई तकनीकों को क्वांटम-प्रेरित प्रोसेसिंग के साथ जोड़ा गया है। यह मॉडल दिमागी संकेतों के अलग-अलग पहलुओं—जैसे फ्रीक्वेंसी पैटर्न और स्पेशियल डिस्ट्रीब्यूशन—का विश्लेषण करता है, जिससे यूजर की मंशा को ज्यादा सटीक तरीके से समझा जा सके और प्रतिक्रिया समय भी कम बना रहे।
टेस्टिंग के दौरान इस सिस्टम ने 92 प्रतिशत से अधिक सटीकता हासिल की और इसकी प्रतिक्रिया समय 80 मिलीसेकंड से कम रही, जो लगभग रियल-टाइम संचालन के बराबर है। साथ ही, पारंपरिक तरीकों की तुलना में गलत कमांड की संख्या में भी कमी देखी गई, जो ऐसे सहायक उपकरणों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
इस मॉडल को एक अंतरराष्ट्रीय डेटा सेट पर भी परखा गया, जहां अलग-अलग परिस्थितियों में भी इसका प्रदर्शन स्थिर रहा। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसकी कॉम्पैक्ट डिजाइन इसे पोर्टेबल डिवाइस में आसानी से जोड़ने योग्य बनाती है।
संस्थान के इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर Prabhat Kumar Upadhyay ने बताया कि इस रिसर्च का मुख्य उद्देश्य सिस्टम की विश्वसनीयता को बढ़ाना है, ताकि अलग-अलग उपयोगकर्ताओं के लिए भी यह समान रूप से काम कर सके और वास्तविक परिस्थितियों में इस्तेमाल के लिए उपयुक्त बन सके।
शोधकर्ताओं ने व्हीलचेयर का एक कार्यशील प्रोटोटाइप भी तैयार किया है, जिसे रियल-टाइम परिस्थितियों में टेस्ट किया गया। परीक्षण के दौरान व्हीलचेयर ने नेविगेशन कार्यों में स्थिर प्रदर्शन दिखाया। इसमें कमांड वायरलेस तरीके से भेजे जाते हैं, जिससे यूजर के दिमागी संकेतों के आधार पर तुरंत प्रतिक्रिया मिलती है।
यह शोध Indian Council of Medical Research के सहयोग से किया गया है और इसका उद्देश्य ऐसे भरोसेमंद सहायक उपकरण विकसित करना है, जो सिर्फ लैब तक सीमित न रहकर वास्तविक जीवन में भी प्रभावी तरीके से काम कर सकें।




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