
नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने युवाओं को संबोधित किया। दोनों ही नेताओं ने छात्रों को भारत की ज्ञान परंपरा, आधुनिक चुनौतियों और जीवन में आगे बढ़ने के लिए जरूरी मूल्यों की याद दिलाई। कार्यक्रम में मौजूद छात्रों को यह संदेश दिया गया कि सफलता सिर्फ डिग्री से नहीं, बल्कि चरित्र, करुणा और सही दिशा में निरंतर प्रयास से मिलती है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में नालंदा की ऐतिहासिक धरोहर को याद करते हुए कहा कि भगवान महावीर और गौतम बुद्ध ने इसी भूमि से दुनिया को अहिंसा, करुणा और मानवता का संदेश दिया था। उनका कहना था कि नालंदा सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान प्रणाली का उज्ज्वल प्रतीक रहा है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय आठ शताब्दियों तक वैश्विक शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था, जहां एशिया और दुनिया के कई देशों से विद्यार्थी शिक्षा लेने आते थे। इसका पतन केवल भारत ही नहीं, पूरी मानव सभ्यता के लिए एक “गंभीर क्षति” था।
राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि नालंदा का पुनरुद्धार भारत की उस प्रतिबद्धता का हिस्सा है, जिसमें देश अपनी प्राचीन समृद्ध बौद्धिक विरासत को आधुनिक दुनिया के सामने फिर से स्थापित कर रहा है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी “सांस्कृतिक और शैक्षणिक पुनर्जागरण” का प्रतीक बताया।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने छात्रों को वैश्विक अवसरों, भारत की बदलती भूमिका और नई पीढ़ी की जिम्मेदारियों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज का भारत विज्ञान, तकनीक, कूटनीति और नवाचार में तेजी से उभर रहा है, और युवाओं को इस परिवर्तन का सक्रिय हिस्सा बनना चाहिए।
समारोह का माहौल उत्साह और प्रेरणा से भरा रहा, जहां नई पीढ़ी को नालंदा की समृद्ध विरासत और आधुनिक भारत के सपनों को आगे बढ़ाने का संदेश मिला।




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