
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एएस ओका ने न्यायपालिका को लेकर एक अहम और साहसिक टिप्पणी की है। उनका कहना है कि संविधान ने न्यायपालिका के प्रति जिस भरोसे और उम्मीद की नींव रखी थी, आज की प्रणाली उस पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाई है। यह टिप्पणी उन्होंने सोमवार को आयोजित 45वें जेपी मेमोरियल लेक्चर के दौरान की, जिसे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) ने आयोजित किया था।
जस्टिस ओका ने कहा कि अक्सर न्यायपालिका की अपनी उपलब्धियों की चर्चा में इस सच्चाई को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि आम लोगों को अदालतों तक पहुंचने और न्याय पाने में किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने साफ कहा कि अगर यह दावा किया जाता है कि न्यायपालिका पर लोगों का गहरा विश्वास है, तो यह बयान स्वयं जज या वकील नहीं, बल्कि आम नागरिकों की ओर से आना चाहिए।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आर्टिकल 21 पर जोर
अपने व्याख्यान में जस्टिस ओका ने विशेष रूप से आर्टिकल 21 का उल्लेख किया, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। उन्होंने कहा कि यह अधिकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है और अदालतों की जिम्मेदारी है कि वे इस स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
गुणवत्तापूर्ण व त्वरित न्याय ही लोकतंत्र की मूल शर्त
जस्टिस ओका ने याद दिलाया कि भारत का संविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का वादा करता है, लेकिन यह वादा सिर्फ तभी सार्थक हो सकता है जब न्यायपालिका गुणवत्तापूर्ण और समय पर न्याय उपलब्ध कराए। उन्होंने कहा कि धीमी न्याय प्रक्रिया लोगों के अधिकारों को कमजोर करती है और न्यायपालिका पर भरोसे को भी चोट पहुंचाती है।
जजों की कमी और ढांचे की दिक्कतें
जस्टिस ओका ने भारतीय न्याय व्यवस्था की मौजूदा चुनौतियों पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने जजों की संख्या और देश की बढ़ती आबादी के बीच असंतुलन को गंभीर मुद्दा बताया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रति 10 लाख आबादी पर 50 जजों की नियुक्ति का निर्देश दिया था, लेकिन दो दशक बाद भी यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है।
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका का इंफ्रास्ट्रक्चर—चाहे वह कोर्टरूम हों, डिजिटल सुविधाएं हों या बेसिक संसाधन—अभी भी कई राज्यों में बेहद कमजोर स्थिति में है। यह न केवल मुकदमों के लंबित रहने की वजह बनता है, बल्कि लोगों की न्याय तक पहुंच को भी सीमित करता है।
जस्टिस एएस ओका की टिप्पणी न्यायपालिका के भीतर झांकने का अवसर देती है और यह बताती है कि भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब अदालतें जनता की उम्मीदों पर पूरी तरह से खरी उतरें। उनकी यह अपील सिर्फ व्यवस्था की आलोचना नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली को और अधिक जवाबदेह और संवेदनशील बनाने का आह्वान है।




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