
देश में कमर्शियल एलपीजी की सीमित उपलब्धता का प्रभाव अब उच्च शिक्षा संस्थानों पर साफ दिखाई देने लगा है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के हॉस्टल मेस, कैंटीन और प्रशिक्षण रसोई घर गैस आपूर्ति में देरी और कोटा घटने से जूझ रहे हैं। घरेलू एलपीजी की सप्लाई सामान्य रहने के बावजूद कमर्शियल सिलेंडरों की कमी ने संस्थानों को अपने दैनिक संचालन में त्वरित बदलाव करने पर मजबूर किया है।
पुणे, चेन्नई और दिल्ली जैसे प्रमुख छात्र शहरों में मेस संचालन प्रभावित हुआ है। कई जगह मेस प्रबंधकों को मेन्यू से गैस-खपत वाली डिशेज हटानी पड़ी हैं। पुणे के एक निजी कॉलेज में मेस संभाल रहे संदीप चौहान बताते हैं, “पहले हमें हफ्ते में तीन कमर्शियल सिलेंडर मिल जाते थे, लेकिन अब दो पर ही मैनेज करना पड़ रहा है। ऐसे में मेन्यू और कुकिंग टाइमिंग दोनों बदलने पड़े हैं।”
मेस स्टाफ के अनुसार, बल्क कुकिंग, तय समय पर खाना तैयार करना और गैस को कम खर्च करने वाले विकल्प अपनाना अब उनकी दैनिक रणनीति बन गई है। वहीं कई संस्थानों ने अस्थायी रूप से इंडक्शन स्टोव और इलेक्ट्रिक उपकरणों पर दबाव बढ़ाया है।
एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की डीन (प्रशासन) डॉ. मीनल राजपूत का कहना है, “एलपीजी सप्लाई अनिश्चित है, इसलिए हमने इंडक्शन-आधारित किचन लाइनें शुरू कर दी हैं। अगले सेमेस्टर तक सोलर वाटर हीटिंग सिस्टम भी इंस्टॉल हो जाएगा।”
छात्र भी स्थिति को समझते हुए बदलाव की जरूरत महसूस कर रहे हैं। चेन्नई की छात्रा और स्टूडेंट यूनियन प्रतिनिधि तन्वी शेख कहती हैं, “मेस में खाना मिल रहा है, लेकिन वैरायटी कम हो गई है। हम समझते हैं कि गैस की दिक्कत है, पर इंस्टिट्यूट को वैकल्पिक समाधान तेजी से अपनाने चाहिए।”
इधर गैस वितरक भी मांग और आपूर्ति में अंतर की पुष्टि कर रहे हैं। महाराष्ट्र के एक एलपीजी वितरक राजेश पाटिल बताते हैं, “घरेलू सप्लाई में समस्या नहीं है, लेकिन कमर्शियल सिलेंडर की डिमांड ज्यादा और कोटा सीमित होने से डिले हो रहा है। संस्थानों को प्री-बुकिंग शेड्यूल के साथ चलना होगा।”
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट संस्थानों के लिए सीखने का अवसर भी है। ऊर्जा नीति विश्लेषक रुचिर खन्ना के अनुसार, “यह स्थिति अस्थायी जरूर है, लेकिन शिक्षा संस्थानों को अब भी सीख लेनी चाहिए कि एक ही ईंधन पर निर्भर रहना रिस्क बढ़ाता है। धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक और बायोगैस मॉडल पर जाना ही समाधान है।”
भोपाल के एक कॉलेज प्राचार्य डॉ. वी.के. साहू का कहना है कि यह समय ऊर्जा संक्रमण की दिशा में कदम तेज करने का है। वे कहते हैं, “हम गैस पर पूरा दबाव हटाने के लिए इलेक्ट्रिक सिस्टम में निवेश कर रहे हैं। यह संकट हमारे लिए एक तरह से ऊर्जा संक्रमण का अवसर भी बना है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात भले अस्थायी हों, लेकिन इससे संस्थानों में ऊर्जा-कुशल और वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग पर गंभीर चर्चा शुरू हुई है। कई विश्वविद्यालय सोलर आधारित जल-तापन, बायोगैस यूनिट और इलेक्ट्रिक किचन को दीर्घकालिक समाधान के रूप में देख रहे हैं।




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