
देश में शिक्षा से जुड़े एक अहम मुद्दे पर नई बहस तेज हो गई है। 50 से अधिक शिक्षाविदों और स्कॉलर्स ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर NCERT की कक्षा 8 की सोशल साइंस पाठ्यपुस्तक पर लगे सुप्रीम कोर्ट के बैन को “ज्यूडिशियल ओवररीच” करार दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की है, ताकि शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहे असर को रोका जा सके।
ज्यूडिशियरी पर आधारित चैप्टर को बताया गया विवाद का कारण
पत्र लिखने वाले शिक्षाविदों का कहना है कि Exploring Society: India and Beyond नाम की इस किताब पर लगा प्रतिबंध शिक्षा जगत के लिए दूरगामी प्रभाव छोड़ सकता है। खासतौर पर वह अध्याय जिसमें ज्यूडिशियरी की भूमिका, चुनौतियों और सिस्टम से जुड़े सवालों पर चर्चा की गई थी।
स्कॉलर्स का आरोप है कि इस फैसले ने शिक्षकों और अकादमिक विशेषज्ञों की क्षमता को सीमित किया है, क्योंकि इससे वे कंटेंट को वस्तुनिष्ठ तरीके से जांचने और छात्रों के साथ खुली चर्चा करने में कठिनाई महसूस करेंगे। उनका कहना है कि ज्यूडिशियल सिस्टम पर सार्वजनिक बहस को दबाना, शिक्षा के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।
नेचुरल जस्टिस के उल्लंघन का आरोप
पत्र में बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी को स्वत: संज्ञान लेते हुए चैप्टर के कुछ हिस्सों को “आपत्तिजनक” माना और किताब के प्रकाशन पर रोक लगा दी। इसके साथ ही क्रिमिनल कंटेम्प्ट का नोटिस भी जारी किया गया। बाद में टेक्स्टबुक डेवलपमेंट टीम के तीन सदस्यों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई, जिसमें संबंधित संस्थानों को उनसे दूरी बनाने के निर्देश भी शामिल थे।
शिक्षाविदों ने इसे नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया। उनका कहना है कि जिन लोगों पर कार्रवाई हुई उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं मिला। इससे न सिर्फ उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा प्रभावित हुई, बल्कि रोजगार और आजीविका से जुड़े अधिकार भी खतरे में पड़ गए।
“यह मामला पूरी तरह शैक्षणिक प्रकृति का”—स्कॉलर्स की दलील
शिक्षाविदों ने अपने पत्र में लिखा कि पाठ्यक्रम का निर्माण और शिक्षण सामग्री पर निर्णय शैक्षणिक विशेषज्ञों को लेने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन (NCF-SE) 2023 की भावना के अनुरूप होनी चाहिए, जिनमें क्रिटिकल थिंकिंग, संवाद और नागरिक जागरूकता पर जोर दिया गया है।
स्कॉलर्स का तर्क है कि किसी एक उपखंड को लेकर पूरी पाठ्यपुस्तक पर रोक लगाना छात्रों की पढ़ाई और शिक्षकों के काम दोनों पर नकारात्मक असर डालता है। इससे अध्यापकों के बीच सावधानी और डर का माहौल बन सकता है, जिससे स्वस्थ अकादमिक बातचीत प्रभावित होगी।
राष्ट्रपति से NCERT बैन हटाने की अपील
शिक्षाविदों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वे शिक्षा मंत्रालय से बातचीत कर इस प्रतिबंध को वापस लेने का निर्देश दें। साथ ही विवादित चैप्टर हटाकर पुस्तक का प्रकाशन जारी रखने, और लेखकों व डेवलपमेंट टीम पर हुई दंडात्मक कार्रवाई वापस लेने का आग्रह भी किया है।
उनका कहना है कि किसी भी रिव्यू प्रक्रिया में अधिक शैक्षणिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि शिक्षा से जुड़े फैसले पारदर्शी और विशेषज्ञों की राय के आधार पर लिए जा सकें।




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