
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए केंद्र सरकार का लक्ष्य किसानों को ऐसी फसल किस्में, तकनीक और आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराना है, जो उन्हें कम लागत में अधिक और सुरक्षित उत्पादन दे सकें। वह उन्नत कृषि महोत्सव के दौरान मीडिया से अनौपचारिक बातचीत कर रहे थे। चौहान ने स्पष्ट किया कि बदलते मौसम, अनियमित बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव के बीच अब खेती के लिए वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य हो गया है।
मंत्री चौहान ने बताया कि देश के वैज्ञानिक संस्थान ऐसी फसल किस्में विकसित कर रहे हैं, जो अत्यधिक गर्मी, कम पानी या अधिक नमी—तीनों परिस्थितियों में बेहतर टिक सकें। उनका कहना है कि क्लाइमेट चेंज अब एक वास्तविक और गंभीर चुनौती है और इसी कारण केंद्र सरकार जलवायु-सहिष्णु किस्मों को तेजी से किसानों तक पहुँचाने पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि नए अनुसंधानों के आधार पर ऐसी किस्में विकसित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को बेहतर बनाना है।
उन्होंने आगे कहा कि सरकार का फोकस केवल मशीन सब्सिडी तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर सामुदायिक उपयोग के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर और फार्म मशीनरी बैंक का बड़ा नेटवर्क विकसित किया जा रहा है। इन केंद्रों से छोटे और सीमांत किसानों को भी आधुनिक कृषि उपकरण किराये पर उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे महंगी मशीनें खरीदने का दबाव कम होगा। चौहान ने बताया कि केंद्र की सब-मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मेकनाइजेशन (SMAM) के तहत 40 से 80 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जा रही है, ताकि पंचायत, एफपीओ, किसान समूह और स्वयं सहायता समूह लगभग 30 लाख रुपये तक की परियोजनाएँ आसानी से स्थापित कर सकें।
एमपीएलएडीएस फंड से कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने के सवाल पर मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि एमपी लैड्स का उद्देश्य स्थायी सामुदायिक परिसंपत्तियाँ बनाना है—जैसे सड़कें, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, खेल मैदान या स्थिर जिम—जबकि कस्टम हायरिंग सेंटर किराये और संचालन आधारित मॉडल पर चलते हैं, जिनके लिए अलग व्यवस्था की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि इन केंद्रों को बढ़ावा कृषि मशीनीकरण योजनाओं के माध्यम से ही दिया जाएगा, ताकि नीति की पारदर्शिता और उद्देश्य दोनों बनाए रखे जा सकें।
चौहान ने स्वीकार किया कि सांसद सीधे तौर पर एमपी लैड्स से ऐसे केंद्र नहीं बना सकते, लेकिन वे अपने क्षेत्र में कृषि योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। वे किसान समूहों, एफपीओ और पंचायतों के प्रस्ताव आगे बढ़ाने, स्वीकृति में मदद करने और निगरानी सुनिश्चित करने में योगदान दे सकते हैं। उनके अनुसार, जनप्रतिनिधियों की सजगता से ही योजनाओं का लाभ अंतिम छोर तक पहुँच पाता है।
प्राइवेट सेक्टर की भूमिका पर उन्होंने कहा कि कई राज्यों में निजी कंपनियाँ और स्थानीय उद्यमी इस मॉडल में भागीदारी कर रहे हैं। जहाँ स्पष्ट नीति, स्थिर मांग और स्थानीय साझेदारी मिलती है, वहाँ यह मॉडल सफल साबित होता है। सरकार का प्रयास है कि पंचायत, एफपीओ और निजी क्षेत्र मिलकर पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप के माध्यम से ऐसे केंद्र विकसित करें, ताकि किसानों को समय पर और सस्ती सेवा मिले और मशीनों का उपयोग भी लगातार बना रहे।
अंत में, चौहान ने कहा कि यह पूरी पहल किसी दबाव का परिणाम नहीं बल्कि किसान-केन्द्रित सोच और वैज्ञानिक सलाह पर आधारित है। सरकार का उद्देश्य कृषि को आधुनिक तकनीक, जलवायु-अनुकूल रणनीति और बाज़ार आधारित दृष्टिकोण के साथ जोड़कर ऐसा रोडमैप तैयार करना है, जिससे उत्पादन बढ़े, लागत घटे और किसानों की आय स्थिर तथा सुरक्षित हो सके।




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