
भारत खुद को वैश्विक उच्च शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में नीतिगत सुधारों और विदेशी विश्वविद्यालयों की बढ़ती रुचि ने इस दिशा में नई गति दी है। खासतौर पर STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में वैश्विक स्तर के कोर्स अब देश में ही उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है।
आंकड़ों के अनुसार, Ministry of External Affairs और UNESCO की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत अब भी विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों का एक बड़ा स्रोत है। अनुमान है कि हर साल करीब 18 से 20 लाख भारतीय छात्र विदेश जाते हैं। इसके मुकाबले भारत में आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या काफी कम है, जिससे यह अनुपात लगभग 19:1 हो जाता है।
Reserve Bank of India के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय छात्र हर साल विदेश में पढ़ाई पर करीब 60 से 70 अरब डॉलर खर्च करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस मांग का केवल 15–20 प्रतिशत हिस्सा भी भारत में ही रह जाए, तो हर साल 10 से 14 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है।
भारत में ही मिलेंगे इंटरनेशनल कोर्स
इसी पृष्ठभूमि में कई प्रमुख विदेशी विश्वविद्यालय—जैसे University of Aberdeen, University of Bristol, Illinois Institute of Technology, University of Liverpool, Victoria University और University of York—ने भारत में अपने कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनाई है। इन संस्थानों में आने वाले शैक्षणिक सत्र से दाखिले शुरू होने की उम्मीद है।
इन विश्वविद्यालयों ने मिलकर करीब ₹1000 करोड़ का स्कॉलरशिप फंड तैयार किया है। इसके तहत स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों को मेरिट और जरूरत के आधार पर आर्थिक सहायता दी जाएगी। चयनित छात्रों को 10 प्रतिशत से लेकर पूरी फीस तक की छूट मिल सकती है। इसके साथ ही, टेक्नोलॉजी आधारित कोर्स और सीटों की संख्या बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
नई नीतियों से मिला बढ़ावा
इन बदलावों के पीछे नीतिगत समर्थन भी अहम भूमिका निभा रहा है। University Grants Commission (UGC) ने 2023 के नियमों के तहत शीर्ष विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति दी है, बशर्ते वे तय गुणवत्ता और प्रशासनिक मानकों को पूरा करें।
यह कदम भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जहां पहले विदेशी संस्थानों की मौजूदगी काफी सीमित थी।
नामांकन बढ़ाने का लक्ष्य
All India Survey on Higher Education (AISHE) 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में उच्च शिक्षा का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) करीब 28.4 प्रतिशत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत इसे 2035 तक 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और देश में ही बेहतर अवसर उपलब्ध कराने से इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिल सकती है।
छोटे शहरों के छात्रों को मिलेगा फायदा
विश्लेषकों के अनुसार, इंटरनेशनल कैंपस और स्कॉलरशिप की शुरुआत से गैर-मेट्रो शहरों के छात्रों और पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों के लिए नए अवसर खुलेंगे। इससे न केवल शिक्षा तक पहुंच आसान होगी, बल्कि उभरते क्षेत्रों में देश के प्रतिभाशाली युवाओं को बेहतर मंच भी मिलेगा।
बदलती दिशा की ओर संकेत
हालांकि इन पहलों का लंबी अवधि में क्या असर होगा, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था अब तेजी से एक ग्लोबली कनेक्टेड सिस्टम की ओर बढ़ रही है, जहां किफायत और पहुंच सबसे अहम मुद्दे बनकर उभर रहे हैं।




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