
देश में बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट के बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस ओक ने समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है। चेन्नई में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि किसी भी काम को करने से पहले उसे वैज्ञानिक आधार पर परखना जरूरी है, चाहे वह सामाजिक परंपरा हो या धार्मिक आस्था से जुड़ा कोई कार्य।
उन्होंने साफ कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह सही और गलत के बीच फर्क समझने में मदद करता है। उनके मुताबिक, समाज को आगे बढ़ाने के लिए यह सोच बेहद जरूरी है।
परंपराएं और पर्यावरण: संतुलन की जरूरत
जस्टिस ओक ने उदाहरण देते हुए कहा कि नदियों में दूध बहाने या बड़े पैमाने पर स्नान जैसी गतिविधियों को अगर वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए, तो यह साफ होता है कि इससे जलीय जीवन पर असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि दूध पानी में ऑक्सीजन के स्तर को प्रभावित करता है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है और पानी को सामान्य स्थिति में लौटने में समय लगता है।
यह टिप्पणी उन्होंने एक सवाल के जवाब में की। यह कार्यक्रम Rakesh Law Foundation और Roja Muthiah Research Library की ओर से आयोजित वार्षिक व्याख्यान श्रृंखला का हिस्सा था, जिसका विषय “पर्यावरण – अधिकार या कर्तव्य” रखा गया था।
प्रदूषण का बोझ गरीबों पर ज्यादा
अपने संबोधन में जस्टिस ओक ने यह भी कहा कि प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर समाज के कमजोर वर्ग पर पड़ता है। उन्होंने चिंता जताई कि बड़े शहरों में रहने वाले लोग, जो अक्सर प्रदूषण के लिए जिम्मेदार होते हैं, वे अपेक्षाकृत सुरक्षित जीवन जीते हैं, जबकि गरीब तबका इसके गंभीर परिणाम झेलता है।
पर्यावरण मुद्दों पर राजनीति की उदासीनता
उन्होंने राजनीतिक दलों के रवैये पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों को राजनीति में पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही है, जबकि यह सीधे लोगों के जीवन और भविष्य से जुड़ा विषय है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं की भूमिका अहम
जस्टिस ओक ने पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले लोगों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने M C Mehta जैसे कार्यकर्ताओं का जिक्र करते हुए कहा कि वे कानून के उल्लंघन के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन उन्हें उतना जनसमर्थन नहीं मिल पाता, जितना मिलना चाहिए।
जागरूकता ही समाधान
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि पर्यावरण कानूनों और संविधान के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। जब तक आम नागरिक पर्यावरण को लेकर जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक इस संकट से प्रभावी तरीके से निपटना मुश्किल होगा।
उनका संदेश साफ था—पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है, और इसके लिए वैज्ञानिक सोच अपनाना जरूरी है।




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