
“हर दिन स्कूल की नई डिमांड—कभी यूनिफॉर्म, कभी किताबें, कभी फीस… और इसके बाद भी बच्चा क्या सीख रहा है?” ऐसे ही सवालों से परेशान होकर नोएडा के कुछ अभिभावकों ने पारंपरिक स्कूल सिस्टम से अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल से निकालकर घर पर पढ़ाना शुरू किया। यही से होमस्कूलिंग की शुरुआत हुई, जो अब बड़े शहरों से निकलकर छोटे शहरों तक तेजी से फैल रही है।
क्यों बढ़ रहा है होमस्कूलिंग का चलन?
बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में पहले से ही यह ट्रेंड दिख रहा था, लेकिन अब छोटे शहरों में भी माता-पिता इसे अपनाने लगे हैं। बदलते समय में जहां बच्चों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय स्किल्स सिखाने पर जोर बढ़ा है, वहीं कई अभिभावक पारंपरिक शिक्षा को बोझिल मानते हुए विकल्प तलाश रहे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल लर्निंग के बढ़ते प्रभाव ने भी पढ़ाई के तरीकों को बदल दिया है। अब घर पर पढ़ाई के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, डिजिटल कंटेंट और पर्सनलाइज्ड लर्निंग के कई विकल्प मौजूद हैं।
क्या भारत में होमस्कूलिंग कानूनी है?
कानूनी तौर पर भारत में होमस्कूलिंग पर कोई रोक नहीं है। Right to Education Act 2009 के तहत 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि शिक्षा केवल स्कूल में ही दी जाए।
इसके अलावा National Education Policy 2020 भी वैकल्पिक और लचीली शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा देती है, जिससे होमस्कूलिंग को अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता है।
बोर्ड परीक्षा और आगे की पढ़ाई कैसे?
होमस्कूलिंग का मतलब यह नहीं है कि बच्चा औपचारिक शिक्षा से बाहर हो जाता है। भारत में National Institute of Open Schooling के जरिए छात्र 10वीं और 12वीं की परीक्षा प्राइवेट कैंडिडेट के रूप में दे सकते हैं। इसकी मार्कशीट देश के अन्य बोर्ड्स की तरह मान्य होती है।
इसके अलावा Cambridge International जैसे अंतरराष्ट्रीय बोर्ड भी विकल्प के तौर पर मौजूद हैं। ऐसे छात्र आगे चलकर JEE, NEET और CLAT जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बैठ सकते हैं और कॉलेज में दाखिला ले सकते हैं।
खर्च कितना आता है?
होमस्कूलिंग सस्ती भी हो सकती है और महंगी भी—यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कौन-सा मॉडल अपनाते हैं। NIOS के जरिए पढ़ाई करना अपेक्षाकृत किफायती होता है, जहां रजिस्ट्रेशन फीस कम होती है।
वहीं कुछ अभिभावक मिलकर छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर बच्चों को पढ़ाते हैं, जिसमें खर्च बढ़ सकता है। अगर ऑनलाइन इंटरनेशनल कोर्स या निजी ट्यूटर्स की मदद ली जाए, तो लागत और ज्यादा हो सकती है, हालांकि कई मामलों में यह बड़े प्राइवेट स्कूलों की फीस से कम ही रहती है।
सोशल और अनुशासन से जुड़े सवाल
एक बड़ी चिंता यह भी होती है कि घर पर पढ़ने वाले बच्चे सामाजिक रूप से अलग न पड़ जाएं। विशेषज्ञ मानते हैं कि स्कूल केवल पढ़ाई का ही नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास का भी केंद्र होता है, जहां बच्चे अनुशासन और सामाजिक कौशल सीखते हैं।
इसी जरूरत को देखते हुए अब देश में होमस्कूलिंग कम्युनिटीज बनने लगी हैं। यहां बच्चे स्पोर्ट्स, म्यूजिक, आर्ट और अन्य गतिविधियों के जरिए एक-दूसरे से जुड़ते हैं। कई शहरों में ऐसे बच्चे साथ मिलकर ट्रिप्स और ग्रुप एक्टिविटीज भी करते हैं।
क्या होमस्कूलिंग हर किसी के लिए सही है?
होमस्कूलिंग अपनाने से पहले अभिभावकों को अच्छी तरह सोच-समझकर फैसला लेना चाहिए। यह केवल स्कूल छोड़ने का निर्णय नहीं, बल्कि एक पूरी नई शिक्षा प्रणाली को अपनाने जैसा है। इसमें सही बोर्ड का चयन, पढ़ाई का टाइम-टेबल और बच्चे की रुचि के अनुसार योजना बनाना बेहद जरूरी होता है।
भारत में होमस्कूलिंग एक उभरता हुआ विकल्प है, जो पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ नई सोच को भी जगह देता है। हालांकि यह हर परिवार के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता, लेकिन सही योजना और समझ के साथ यह बच्चों को अधिक लचीला और स्किल-आधारित सीखने का मौका दे सकता है।




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