
जैसे-जैसे खरीदारी के फैसलों में सस्टेनेबिलिटी (पर्यावरणीय जिम्मेदारी) का महत्व बढ़ रहा है, एक नए अकादमिक अध्ययन ने रिटेल कंपनियों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित एक ढांचा प्रस्तावित किया है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि उपभोक्ताओं की पसंद किस तरह रियल टाइम में बदल रही है। अध्ययन इस चुनौती पर केंद्रित है कि कंपनियां कैसे रीसाइक्लिंग, ईको-प्रमाणन, किफायती कीमत और ब्रांड पर भरोसे जैसे बदलते मानकों के बीच अपने व्यावसायिक लक्ष्यों को संतुलित रखें।
यह शोध Goa Institute of Management, Babasaheb Bhimrao Ambedkar University और Graphic Era Deemed to be University के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है। इसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल Knowledge Management Research & Practice में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, पारंपरिक उपभोक्ता व्यवहार मॉडल इन तेजी से बदलते रुझानों को पूरी तरह पकड़ नहीं पाते, जिससे ऐसे सिस्टम की जरूरत महसूस होती है जो डेटा विश्लेषण को संगठनात्मक निर्णयों से जोड़ सके।
नए मॉडल में मशीन लर्निंग टूल्स का उपयोग कर उभरते हुए उपभोक्ता समूहों की पहचान की जाती है। यह सिस्टम लगातार ग्राहकों से जुड़ी जानकारियों को अपडेट करता है और उन्हें प्राइसिंग, स्टॉक मैनेजमेंट और कम्युनिकेशन रणनीतियों जैसे व्यावहारिक फैसलों में बदलने में मदद करता है। इस फ्रेमवर्क में उन्नत तकनीक जैसे Self-Organising Incremental Neural Networks (SOINNs), Principal Component Analysis (PCA) और Variational Autoencoders (VAEs) को शामिल किया गया है। साथ ही, यह डेटा विश्लेषण को संस्थानों के भीतर ज्ञान साझा करने की प्रक्रिया से भी जोड़ता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह उपभोक्ता जानकारी को एक ऐसे ज्ञान के रूप में देखता है, जो समय के साथ विकसित होता है और जिसे अलग-अलग विभागों में साझा और उपयोग किया जा सकता है।
Sumit Tripathi, जो गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, ने बताया कि अध्ययन में उपभोक्ताओं को सस्टेनेबिलिटी के आधार पर पांच बड़े समूहों में बांटा गया है। इनमें “सस्टेनेबिलिटी चैंपियंस” से लेकर कीमत को प्राथमिकता देने वाले पारंपरिक खरीदार तक शामिल हैं। इससे कंपनियों को ऐसी रणनीतियां बनाने में मदद मिल सकती है, जो पर्यावरणीय जिम्मेदारी और व्यावसायिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखें।
अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि उपभोक्ता जो कहते हैं और जो खरीदते हैं, उनके बीच बड़ा अंतर मौजूद है। शोधकर्ताओं के अनुसार, कीमत को लेकर संवेदनशीलता और भरोसे की कमी इस अंतर की मुख्य वजह हैं। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि ज्यादा पारदर्शिता, किफायती उत्पाद और लक्षित संचार रणनीतियां इस अंतर को कम कर सकती हैं।
Dinesh Chandra Pandey, जो ग्राफिक एरा डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं, ने कहा कि यह रिसर्च यह भी दिखाती है कि किसी संगठन की कार्य संस्कृति और डेटा विश्लेषण पर भरोसा इस बात को प्रभावित करता है कि AI से मिली जानकारी को फैसलों में कितनी प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जाता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह निष्कर्ष उन कंपनियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं, जो अपनी सस्टेनेबिलिटी रणनीतियों को मजबूत करना चाहती हैं। साथ ही, यह नीति निर्माताओं और शैक्षणिक संस्थानों के लिए भी अहम साबित हो सकता है, जो पर्यावरण के अनुकूल उपभोग और AI आधारित अध्ययन को बढ़ावा देना चाहते हैं।




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