
Indian Institute of Technology Guwahati के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह समझने की कोशिश की गई है कि स्कूलों में कार्यसंस्कृति और नेतृत्व की शैली शिक्षकों के भावनात्मक स्वास्थ्य और नौकरी से संतुष्टि को किस तरह प्रभावित करती है। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल Qualitative Research in Organisations and Management में प्रकाशित हुआ है।
इस शोध में ‘वर्कप्लेस ऑथेंटिसिटी’ यानी कार्यस्थल पर अपनी वास्तविक पहचान के साथ सहज रहने की अवधारणा पर विशेष ध्यान दिया गया है। अध्ययन के मुताबिक, स्कूलों में मौजूद पदानुक्रम (हायरार्की) इस बात को काफी हद तक तय करता है कि शिक्षक अपने सहकर्मियों और वरिष्ठों के साथ कितनी सहजता से बातचीत कर पाते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि शिक्षक कक्षा में छात्रों के साथ बातचीत के दौरान खुद को ज्यादा स्वाभाविक और सहज महसूस करते हैं। वहीं, संस्थागत दबाव और वरिष्ठता से जुड़े माहौल के कारण वे कई बार अपनी असली सोच या व्यक्तित्व के कुछ पहलुओं को कार्यस्थल पर व्यक्त नहीं कर पाते। इस असंतुलन का असर उनके तनाव स्तर और नौकरी से संतुष्टि पर पड़ता है।
अध्ययन से जुड़े Abraham Cyril Issac, जो आईआईटी गुवाहाटी के स्कूल ऑफ बिजनेस में सहायक प्रोफेसर हैं, ने कहा, “कक्षा में वास्तविकता (ऑथेंटिसिटी) शिक्षण को जीवंत बनाती है, लेकिन संस्थान के अन्य हिस्सों में इसकी कमी इसे दबा देती है।”
यह अध्ययन 30 उच्च माध्यमिक स्कूल शिक्षकों के जवाबों के गुणात्मक विश्लेषण पर आधारित है। इन जवाबों को ओपन-एंडेड निबंध प्रश्नों के माध्यम से एकत्र किया गया था। शोधकर्ताओं ने ‘गियोइया मेथड’ का उपयोग करते हुए मुख्य पैटर्न और विषयों की पहचान की और ‘टीचर वर्कप्लेस ऑथेंटिसिटी इम्पैक्ट मॉडल’ (TWAIM) नामक एक ढांचा विकसित किया।
इस मॉडल के अनुसार, जिन शिक्षकों में ऑथेंटिसिटी का स्तर अधिक पाया गया, वे अपने संस्थान से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं और कार्यस्थल की चुनौतियों—जैसे काम का दबाव या आलोचना—से बेहतर तरीके से निपटते हैं। वहीं, जहां कार्यस्थल पर राजनीति और अत्यधिक दबाव का माहौल होता है, वहां खासकर नए शिक्षकों में आत्मविश्वास और सहजता कम देखी गई।
अध्ययन के निष्कर्षों पर टिप्पणी करते हुए इस्साक ने कहा, “शिक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ा सुधार ढांचे से नहीं, बल्कि संस्कृति से आता है। अगर शिक्षकों को खुद के रूप में काम करने की आजादी मिले, तो उनका प्रदर्शन अपने आप बेहतर होगा।”
शोध में यह भी सुझाव दिया गया है कि स्कूल अगर सहयोगी माहौल विकसित करें और नेतृत्व में पारदर्शिता व सहजता को बढ़ावा दें, तो शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य और संतुष्टि में सुधार हो सकता है। इसके अलावा, नेतृत्व प्रशिक्षण, काम के संतुलित वितरण और कार्यस्थल के व्यवहार से जुड़े स्पष्ट नियम भी इस दिशा में मददगार हो सकते हैं।
शोधकर्ता आगे इस मॉडल की उपयोगिता को अलग-अलग संस्थानों में परखने के लिए मिश्रित शोध पद्धति (मिक्स्ड-मेथड) का उपयोग करने की योजना बना रहे हैं। यह अध्ययन शिक्षा क्षेत्र में शिक्षकों की स्थिरता और कार्य परिस्थितियों पर चल रही चर्चाओं को नई दिशा देता है।




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