
संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में शामिल CSAT पेपर को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। Union Public Service Commission द्वारा आयोजित इस परीक्षा के पैटर्न पर Parliamentary Standing Committee ने गंभीर सवाल उठाए हैं और इसकी व्यापक समीक्षा की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि मौजूदा स्वरूप खासकर आर्ट्स और गैर-तकनीकी पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है, जिससे सिविल सेवाओं में विविधता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, अभी तक आयोग की ओर से किसी बदलाव की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
समिति ने अपने सुझावों में कहा है कि CSAT के सिलेबस और कठिनाई स्तर का पुनर्मूल्यांकन जरूरी है। मौजूदा पैटर्न में गणित और रीजनिंग से जुड़े सवालों का अनुपात अधिक है, जो गैर-साइंस बैकग्राउंड के उम्मीदवारों के लिए असंतुलन पैदा करता है। ऐसे में परीक्षा को इस तरह डिजाइन करने की जरूरत बताई गई है कि सभी विषयों के छात्र समान अवसर के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि CSAT का झुकाव क्वांटिटेटिव और एनालिटिकल प्रश्नों की ओर अधिक है, जिसका असर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले अभ्यर्थियों पर भी पड़ता है। संसाधनों और कोचिंग सुविधाओं की कमी के कारण कई प्रतिभाशाली छात्र प्रारंभिक परीक्षा के इसी चरण में बाहर हो जाते हैं, जिससे अवसरों की समानता पर सवाल खड़े होते हैं।
वर्तमान व्यवस्था के तहत सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में दो पेपर होते हैं—जनरल स्टडीज (पेपर 1) और CSAT (पेपर 2)। CSAT को केवल क्वालिफाइंग पेपर के रूप में रखा गया है, जिसमें 33 प्रतिशत यानी 66 अंक लाना अनिवार्य होता है। यदि कोई अभ्यर्थी इस पेपर में निर्धारित न्यूनतम अंक हासिल नहीं कर पाता, तो उसके जनरल स्टडीज पेपर का मूल्यांकन नहीं किया जाता।
इस मुद्दे की गूंज संसद तक भी पहुंची है। राज्यसभा में बृजलाल ने CSAT को समाप्त करने या इसे अधिक संतुलित बनाने की मांग उठाई। उनका तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था के चलते चयनित उम्मीदवारों में इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों की संख्या अधिक हो जाती है, जिससे सिविल सेवाओं की विविधता प्रभावित होती है।
इसके साथ ही परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने की मांग भी सामने आई है। समिति और सांसदों का कहना है कि CSAT में असफल रहने वाले उम्मीदवारों को भी उनके अंक और विस्तृत फीडबैक दिया जाना चाहिए, ताकि वे अपनी कमजोरियों को समझकर बेहतर तैयारी कर सकें।
कुल मिलाकर, संसदीय समिति का जोर CSAT को अधिक संतुलित, पारदर्शी और सभी पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के लिए न्यायसंगत बनाने पर है। अब नजर इस बात पर है कि Union Public Service Commission इस पर क्या रुख अपनाता है और क्या भविष्य में परीक्षा पैटर्न में कोई बदलाव देखने को मिलता है।




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