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करियर चुनना महिला का अधिकार, इसे ‘क्रूरता’ नहीं कहा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

करियर चुनना महिला का अधिकार, इसे ‘क्रूरता’ नहीं कहा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

करियर चुनना महिला का अधिकार, इसे ‘क्रूरता’ नहीं कहा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकार और पेशेवर स्वतंत्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी योग्य महिला का अपने करियर को आगे बढ़ाना या अपने बच्चे के लिए सुरक्षित और स्थिर माहौल सुनिश्चित करना क्रूरता या परित्याग नहीं माना जा सकता।

शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि किसी महिला के पेशेवर फैसलों को वैवाहिक रिश्ते के खिलाफ मानना “सामंती सोच” को दर्शाता है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट और गुजरात हाई कोर्ट की उन टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई, जिनमें महिला के करियर को वैवाहिक दायित्वों के खिलाफ माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों की सोच पर उठाए सवाल

यह मामला अलग रह रहे पति-पत्नी के बीच तलाक से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता शामिल थे।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि 21वीं सदी में भी किसी महिला के करियर को “क्रूरता” या “परित्याग” कहना बेहद पिछड़ी और रूढ़िवादी सोच को दर्शाता है। अदालत ने कहा कि एक महिला की पेशेवर पहचान विवाह के भीतर किसी “अनकहे वीटो” के अधीन नहीं हो सकती।

महिला दंत चिकित्सक के करियर को बनाया गया मुद्दा

मामले में महिला एक दंत चिकित्सक थीं, जिन्होंने अहमदाबाद में अपना डेंटल क्लिनिक शुरू करने का फैसला लिया था। पति सेना अधिकारी थे और उनकी पोस्टिंग दूरस्थ स्थानों पर होती रहती थी।

निचली अदालतों ने महिला के अलग रहने और करियर जारी रखने के फैसले को वैवाहिक जिम्मेदारियों से दूरी माना था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि महिला ने अपनी मेहनत और शिक्षा से पेशेवर योग्यता हासिल की है। ऐसे में उससे यह उम्मीद करना कि वह अपना करियर छोड़कर केवल पति की पोस्टिंग के अनुसार जीवन जिए, उचित नहीं कहा जा सकता।

बच्चे के बेहतर भविष्य को बताया वैध कारण

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि महिला का अपने बच्चे के लिए स्थिर और सुरक्षित वातावरण चुनना किसी भी तरह से वैवाहिक दायित्वों का उल्लंघन नहीं है।

अदालत ने माना कि महिला ने अपने बच्चे के भविष्य और पेशेवर जीवन दोनों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया था। इसे पति के खिलाफ क्रूर व्यवहार नहीं कहा जा सकता।

तलाक बरकरार, लेकिन आधार बदला

महिला ने अदालत में यह भी कहा कि अब सुलह की कोई संभावना नहीं बची है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तलाक की डिक्री को बरकरार रखा, लेकिन उसके आधार को बदल दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक “विवाह के पूरी तरह टूट जाने” के आधार पर स्वीकार किया जा रहा है, न कि महिला द्वारा कथित क्रूरता या परित्याग के कारण।

महिलाओं की स्वायत्तता पर बड़ा संदेश

न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने फैसले में कहा कि फैमिली कोर्ट की टिप्पणियां केवल कानूनी रूप से गलत नहीं थीं, बल्कि चिंताजनक भी थीं।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में कामकाजी महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला महिलाओं की पेशेवर स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण संदेश देता है।

अदालत ने साफ कहा कि किसी महिला को केवल इसलिए अपने सपने और करियर छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि वह शादीशुदा है। आधुनिक समाज में पति-पत्नी दोनों के अधिकार और आकांक्षाएं समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

Asmita Sarkar

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