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भारत में ऑप्टोमेट्री शिक्षा क्यों बन रही है जरूरी? जानिए हेल्थकेयर सेक्टर में बढ़ती मांग और करियर के अवसर

भारत में ऑप्टोमेट्री शिक्षा क्यों बन रही है जरूरी? जानिए हेल्थकेयर सेक्टर में बढ़ती मांग और करियर के अवसर

भारत में ऑप्टोमेट्री शिक्षा क्यों बन रही है जरूरी? जानिए हेल्थकेयर सेक्टर में बढ़ती मांग और करियर के अवसर

भारत का हेल्थकेयर सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है और इसके साथ ही अब उन एलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स पर भी ध्यान बढ़ रहा है, जो फ्रंटलाइन मेडिकल सेवाओं की रीढ़ माने जाते हैं। इनमें ऑप्टोमेट्रिस्ट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ये विशेषज्ञ प्राथमिक नेत्र देखभाल सेवाएं प्रदान करने, आंखों से जुड़ी समस्याओं की शुरुआती पहचान करने और विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सा सेवाओं पर बढ़ते दबाव को कम करने में अहम योगदान देते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि देशभर में बेहतर और सुलभ नेत्र देखभाल सुनिश्चित करने के लिए ऑप्टोमेट्री शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट सिस्टम को मजबूत बनाना अब बेहद जरूरी हो गया है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में ऑप्टोमेट्री शिक्षा ने कई स्तरों पर विकास किया है। आज इस क्षेत्र में शॉर्ट-टर्म डिप्लोमा कोर्स से लेकर फुल अंडरग्रेजुएट डिग्री प्रोग्राम तक उपलब्ध हैं। लेकिन इस असंगठित विकास के कारण पाठ्यक्रम की गुणवत्ता, क्लीनिकल एक्सपोजर और प्रैक्टिकल स्किल्स में काफी असमानता देखने को मिलती है। कई संस्थानों में छात्रों को थ्योरी की अच्छी शिक्षा तो मिलती है, लेकिन मरीजों के साथ व्यावहारिक अनुभव सीमित होता है। इससे कक्षा में सीखी गई जानकारी और वास्तविक हेल्थकेयर सेवाओं के बीच अंतर पैदा हो जाता है।

इस सेक्टर की एक बड़ी चिंता डायग्नोस्टिक और रेफरल स्किल्स का असमान विकास भी है। ऑप्टोमेट्रिस्ट अक्सर आंखों की समस्या से जुड़े मरीजों के लिए पहला संपर्क बिंदु होते हैं। ऐसे में यदि क्लीनिकल ट्रेनिंग पर्याप्त न हो, तो शुरुआती जांच और समय पर इलाज प्रभावित हो सकता है।

भारत में एलाइड हेल्थकेयर शिक्षा को व्यवस्थित और मानकीकृत करने की दिशा में नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशंस एक्ट, 2021 को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस नए ढांचे का उद्देश्य ऑप्टोमेट्री शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना और इंटरडिसिप्लिनरी लर्निंग को मजबूत करना है।

नए पाठ्यक्रम दिशानिर्देशों के तहत छात्रों को अब बेसिक मेडिकल साइंस के साथ-साथ आंखों की बीमारियां, लो विजन केयर और कॉन्टैक्ट लेंस प्रैक्टिस जैसे विशेष विषयों की भी पढ़ाई कराई जा रही है। इसके अलावा फार्माकोलॉजी, रिसर्च मेथडोलॉजी और हेल्थकेयर एथिक्स जैसे इंटरडिसिप्लिनरी विषयों को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, ताकि भविष्य के प्रोफेशनल्स मरीजों की देखभाल को अधिक समग्र तरीके से समझ सकें।

इसके साथ ही अब कम्युनिकेशन स्किल्स, एथिक्स और प्रैक्टिस मैनेजमेंट पर भी ज्यादा जोर दिया जा रहा है। आज के हेल्थकेयर माहौल में एलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स से केवल तकनीकी ज्ञान ही नहीं, बल्कि मरीजों को सही सलाह देने, क्लिनिक मैनेज करने और मल्टीडिसिप्लिनरी हेल्थकेयर टीम के साथ काम करने की क्षमता भी अपेक्षित होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुपरवाइज्ड क्लीनिकल इंटर्नशिप, इंडस्ट्री पार्टनरशिप और टेक्नोलॉजी आधारित शिक्षा को मजबूत करना बेहद जरूरी होगा। इससे ऐसा कार्यबल तैयार किया जा सकेगा जो भारत में तेजी से बढ़ रही नेत्र देखभाल जरूरतों को पूरा कर सके। डायबिटीज से जुड़ी आंखों की बीमारियों, डिजिटल आई स्ट्रेन और उम्र से संबंधित नेत्र रोगों के बढ़ते मामलों के कारण प्रशिक्षित ऑप्टोमेट्रिस्ट की मांग पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

हेल्थकेयर सिस्टम अब तेजी से प्रिवेंटिव और कम्युनिटी-बेस्ड केयर की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में ऑप्टोमेट्री शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार देशभर में लाखों लोगों को सस्ती, सुलभ और प्रभावी नेत्र देखभाल सेवाएं उपलब्ध कराने में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकता है।

Asmita Sarkar

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