
भारत की आरक्षण व्यवस्था ऐसे समय में बड़ी परीक्षा से गुजर रही है, जब देश में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हो रहा है।
यूनेस्को की हायर एजुकेशन ग्लोबल ट्रेंड्स रिपोर्ट 2026 ने नीति और जमीनी हकीकत के बीच साफ अंतर दिखाया है। रिपोर्ट में यूजीसी के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शीर्ष शिक्षण संस्थानों में आरक्षित श्रेणी के करीब 30% फैकल्टी पद अब भी खाली पड़े हैं।
ऐसे सिस्टम के लिए, जिसे ऐतिहासिक सामाजिक बहिष्कार को दूर करने के उद्देश्य से बनाया गया था, यह आंकड़ा गंभीर सवाल खड़े करता है।
खाली पद और अधूरे वादे
रिपोर्ट मानती है कि कोटा व्यवस्था सामाजिक समावेशन का अहम हिस्सा है। रिपोर्ट में कहा गया है, “कोटा आधारित व्यवस्था अधिकार आधारित समावेशन का तरीका है।”
हालांकि, रिपोर्ट यह भी बताती है कि नीतियों और उनके लागू होने के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। आरक्षित पद मौजूद हैं, लेकिन नियुक्तियों की रफ्तार अब भी धीमी है।
इस मामले में भारत अकेला नहीं है। रिपोर्ट में भारत की तुलना ब्राजील जैसे देशों से की गई है, जहां लंबे समय से जाति या नस्ल आधारित भेदभाव को खत्म करने के लिए कोटा सिस्टम लागू है। लेकिन अब वहां भी इन व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है।
रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि यह कोई एक बार की समस्या नहीं है। देश के प्रमुख संस्थानों में भी आरक्षित पद खाली रहना दिखाता है कि समस्या अलग-अलग संस्थानों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से जुड़ी हुई है।
कानूनी चुनौतियां भी बढ़ीं
आरक्षण व्यवस्था पर दबाव सिर्फ नियुक्तियों तक सीमित नहीं है। अदालतों और नीति बहसों में भी इस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, “भारत में कानूनी और राजनीतिक स्तर पर आरक्षण नीतियों को बढ़ती चुनौती मिल रही है।”
इसमें हाल के कई घटनाक्रम शामिल हैं, जैसे सुप्रीम कोर्ट का अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति देने वाला फैसला, ओबीसी क्रीमी लेयर को लेकर जारी बहस, और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण पर उठती आलोचनाएं।
रिपोर्ट ने वैश्विक संदर्भ भी दिया है। इसमें अमेरिका का उदाहरण शामिल किया गया है, जहां एडमिशन में नस्ल आधारित अफर्मेटिव एक्शन को पहले ही खत्म किया जा चुका है।
इससे साफ है कि दुनिया भर में समावेशन से जुड़ी नीतियों पर नए सिरे से बहस तेज हो रही है।
फंडिंग की कमी ने बढ़ाई असमानता
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ शिक्षा तक पहुंच मिल जाना बराबरी की गारंटी नहीं है।
भारत उच्च शिक्षा पर अपने जीडीपी का 1.28% खर्च करता है, जो दक्षिण और पश्चिम एशिया में सबसे ज्यादा है। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि फंडिंग के मामले में भी बड़ा असंतुलन मौजूद है।
रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय स्तर के प्रतिष्ठित संस्थानों को पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती है, जबकि कई राज्य स्तरीय कॉलेज और निजी संस्थान सीमित बजट में काम कर रहे हैं।
इसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ता है, जिनके लिए आरक्षण नीति बनाई गई थी। पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी और कम आय वाले छात्र अधिकतर राज्य विश्वविद्यालयों और निजी कॉलेजों में दाखिला लेते हैं।
इन्हीं संस्थानों में फंडिंग की कमी, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और सीमित अवसर जैसी समस्याएं ज्यादा हैं।
यानी आरक्षण छात्रों के लिए शिक्षा का दरवाजा तो खोलता है, लेकिन दाखिले के बाद मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता अब भी काफी अलग-अलग है।
डेटा की कमी से छिप रही असली तस्वीर
रिपोर्ट ने एक और गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है, जो अक्सर चर्चा में नहीं आता।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) मुख्य रूप से संस्थानों द्वारा स्वैच्छिक रूप से भेजे गए आंकड़ों पर निर्भर करता है। इससे डेटा की पूर्णता और समय पर उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
यह बात काफी कुछ स्पष्ट करती है।
विश्वसनीय आंकड़ों के बिना यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आरक्षण का लाभ कितने छात्रों तक पहुंच रहा है, कितने छात्र अपनी डिग्री पूरी कर पा रहे हैं और असली कमी कहां है।
अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में संस्थानों के लिए डेटा रिपोर्टिंग अनिवार्य है, जबकि भारत में ऐसा नहीं है। इससे नीतियां बनाने के लिए मजबूत आधार कमजोर पड़ता है।
एक अहम मोड़ पर खड़ी व्यवस्था
रिपोर्ट ने आरक्षण की जरूरत पर सवाल नहीं उठाया है। बल्कि उसने इसकी अहमियत को दोहराया है।
रिपोर्ट कहती है, “कोटा व्यवस्था उन असमानताओं को सामने लाती है, जिन्हें दूर करना बेहद जरूरी है।”
लेकिन रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि केवल नीति बना देना काफी नहीं है।
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। दाखिलों की संख्या बढ़ रही है और विदेश जाकर पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। यह देश के भीतर मौजूद अवसरों और दबाव, दोनों को दिखाता है।
इसके बावजूद नियुक्तियों, फंडिंग और डेटा से जुड़ी कमियां अब भी बनी हुई हैं।
अब असली सवाल यह नहीं रह गया है कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं।
सवाल यह है कि क्या इसके आसपास की पूरी व्यवस्था इतनी मजबूत है कि यह नीति वास्तव में अपने मकसद को पूरा कर सके।




Add comment