
पिछले पाँच वर्षों में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से जुड़े शोध कार्यों पर गंभीर सवाल उठे हैं। अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स ने बीएचयू के प्रोफेसरों और उनसे जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित 75 से अधिक रिसर्च पेपर वापस ले लिए हैं। आरोप है कि कई रिसर्च पेपरों में एआई-जनरेटेड सामग्री, माइक्रोस्कोपिक इमेज मैनीपुलेशन, डुप्लीकेट डेटा और प्लेगरिज़्म जैसी गंभीर खामियां पाई गईं।
रिसर्च की साख पर बने इन सवालों के बीच यह भी सामने आया है कि 2022 से 2025 के बीच गड़बड़ियों में लगातार बढ़ोतरी हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई टूल्स के आसान उपयोग ने डेटा और इमेज के साथ छेड़छाड़ की संभावनाओं को और बढ़ाया है। कई अंतरराष्ट्रीय जर्नल अब प्रकाशन से पहले बेहद कड़ी स्कैनिंग अपना रहे हैं।
ये सभी वापस लिए गए शोध पत्र रीट्रैक्शन वॉच, नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के सेंटर ऑफ बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन सहित कई शीर्ष जर्नल प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक उपलब्ध हैं। इनमें वे शोध भी शामिल हैं जिनमें बीएचयू के वैज्ञानिक सह-लेखक या सदस्य के रूप में जुड़े थे।
किस वर्ष में कितनी गड़बड़ियां सामने आईं
पिछले छह वर्षों में अनियमितताओं की रेखा लगातार बढ़ती गई। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार—
2020: छह शोध पत्रों में इमेज की सत्यता और डुप्लीकेट डेटा पाया गया।
2021: 12 शोध पत्रों की माइक्रोस्कोपिक तस्वीरों में मैनीपुलेशन सामने आया, खासकर मैटेरियल साइंस और लाइफ साइंस से जुड़े कार्यों में।
2022: 22 शोध पत्र गलत या संदिग्ध पीयर-रिव्यू प्रक्रियाओं के कारण वापस लिए गए।
2023: लगभग 16 पेपरों में प्लेगरिज़्म और कॉपीराइट विवाद की पुष्टि हुई।
2024: 12 बड़े प्रकाशकों ने प्रक्रियात्मक गड़बड़ियों के आधार पर बड़ी संख्या में पेपर रद्द किए।
2025: करीब 13 पेपरों में एआई-जनरेटेड कंटेंट या डेटा का उपयोग पाया गया।
2026: जर्नल्स में जांच अभी जारी है और संख्या और बढ़ सकती है।
अब रिसर्च फंडिंग के नियम सख्त
देश में शोध फंड मुहैया कराने वाली प्रमुख संस्था नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) ने हालिया अनियमितताओं को देखते हुए कड़ा रुख अपनाया है।
4 मई को जारी नए नियमों के तहत—
– किसी भी शोधकर्ता को पिछले पांच वर्षों में वापस लिए गए पेपरों का पूरा विवरण देना अनिवार्य होगा।
– शोध प्रस्ताव पूरी तरह मौलिक होना चाहिए और प्लेगरिज़्म की किसी भी संभावना पर सख्त कार्रवाई होगी।
– यदि प्रस्ताव या सामग्री में एआई की मदद ली गई है, तो इसे स्पष्ट रूप से बताना होगा।
– शोधकर्ताओं को एक घोषणापत्र भी जमा करना होगा कि उनका प्रपोजल पूर्णतः एआई-जनरेटेड नहीं है।
नए नियमों का मतलब है कि जिन शोधकर्ताओं के पेपर रिट्रैक्ट हुए हैं, उनके लिए भविष्य में फंड हासिल करना कठिन हो सकता है। फंडिंग देने वाली एजेंसियां अब शोध कार्य की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को सर्वोच्च महत्व दे रही हैं।




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