
भारत में आईआईटी (IIT) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के बच्चों को भी नौकरी को लेकर काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जहां कई बड़ी कंपनियों ने उन्हें नौकरी देने में भारी कटौती कर दी है, वहीँ छात्र कम सैलरी पैकेज के लिए भी मजबूर हुए हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी (IIT) देश के उन संस्थानों में है जहां पढ़ना छात्रों का एक सपना होता है। माना जाता है कि यहां से पढ़ाई के बाद कैंपस प्लेसमेंट के ज़रिये न सिर्फ उन्हें अच्छी नौकरियां हासिल हो जाती हैं, बल्कि अच्छे-से-अच्छा सैलरी पैकेज भी मिलता है। यानी उनकी लाइफ सेटल हो जाती है। लेकिन आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि यहां पढ़ने वाले बच्चों को भी अब नौकरी पाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। और नौकरी मिल भी रही है, तो हाई पैकेज वाली नहीं बल्कि कम तनख्वाह वाली।
आईआईटी में चल रहे प्लेसमेंट सीजन के दूसरे फेज के बावजूद यहां के ग्रेजुएट्स को फिलहाल नौकरी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। बेहतरीन तकनीकी कौशल और शैक्षिक योग्यता रखने के बावजूद रोज़गार के मोर्चे पर वे खुद को असहाय पा रहे हैं। हालत ऐसी है कि एक अदद नौकरी के लिए तो उन्हें संघर्ष करना पड़ ही रहा है, हायरिंग के कम अवसर ने उन्हें कम सैलरी पैकेज स्वीकार करने को भी मजबूर कर दिया है। छात्रों को कंपनियां अधिकतम 10 लाख सालाना की ही जॉब आफर कर रही हैं। आमतौर पर 6 छात्रों को काम पर रखने वाली कंपनियां कॉलेज से केवल एक या दो को ही जॉब दे रही हैं और वो भी ये ऐसी नौकरियां हैं जो सालाना ₹6 लाख की न्यूनतम सैलरी देती हैं, जबकि अन्य छात्र नौकरियां तलाश रहे हैं। इससे प्लेसमेंट सीजन में भी छात्रों में उत्साह के बजाय निराशा पसरी हुई है। और यह हाल किसी एक आईआईटी का नहीं, कई जाने-माने आईआईटी कैंपसों का है।
आईआईटी इंदौर के डायरेक्टर प्रोफेसर सुहास जोशी कहते हैं, “ग्लोबल इकानॉमिक स्लोडाउन ने आईआईटी इंदौर के 2024 ग्रेजुएट बैच के लिए कैंपस प्लेसमेंट पर काफी असर डाला है। पिछले साल की तुलना में भर्ती करने वालों की संख्या में कमी के कारण प्लेसमेंट सीज़न चुनौतीपूर्ण हो गया है। इस प्रभाव को दूर करने के लिए, आईआईटी इंदौर ने पूर्व छात्रों के नेटवर्क का लाभ उठाकर शुरुआती कदम उठाए हैं और पीएसयू सहित संभावित एम्पलॉयर का विस्तार करने की कोशिश की है।” प्लेसमेंट और सैलरी को लेकर आ परेशानियों की तस्दीक आईआईटी खड़गपुर का एक छात्र भी करता है। उसका कहना है, “स्पेक्ट्रम टेक्नोलॉजीज ने ट्रेनी इंजीनियरों के लिए ₹3.6 लाख और ट्रेनी डिजाइन इंजीनियरों के लिए ₹6 लाख की पेशकश की। स्टार्टून लैब्स और जेम मशीनरी ने सालाना ₹5.5 लाख की पेशकश की। स्काईरूट ने ₹5 लाख की पेशकश की। श्री चैतन्य और नेक्स्ट एजुकेशन सालाना ₹4.8 से 6 लाख की पेशकश कर रहे हैं।”
आईआईटी छात्रों को नौकरी के मोर्चे पर आ रही इन परेशानियों से रोज़गार बाजार की चुनौतियों का भी आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। अभी हाल ही में मुंबई के आईआईटी कैंपस के प्लेसमेंट संकट की ख़बरें आई थीं, जिसकी सर्वत्र चर्चा हुई थी। वहां 30 प्रतिशत से ज़्यादा छात्रों के नौकरी के लिए इंतज़ार करने की बातें सामने आयी थीं। लेकिन छत्तीसगढ़ स्थित आईआईटी भिलाई में तो कैंपस प्लेसमेंट के लिए पंजीकरण कराने वाले 208 में से 64 फीसदी छात्रों को अभी भी प्लेसमेंट मिलना बाकी है। पिछले दिनों तक आईआईटी दिल्ली के भी ओसीएस के साथ रजिस्टर्ड 1,814 छात्रों में से मात्र 1,083 ने नौकरी हासिल की थी, जिसका मतलब है कि लगभग 40% को रोजगार नहीं मिला था।
ग्लोबल आईआईटी एलुमनी सपोर्ट ग्रुप के संस्थापक धीरज सिंह द्वारा दायर एक सूचना के अधिकार (आरटीआई) याचिका के जवाब में भी जो आंकड़े सामने आए हैं, उसके अनुसार आईआईटी रूड़की में पंजीकृत 2,944 छात्रों में से 46 प्रतिशत छात्र को अभी तक प्लेसमेंट नहीं मिला है। आईआईटी तिरूपति को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जहां 46% छात्र अभी भी प्लेसमेंट के अवसरों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालांकि प्लेसमेंट का दूसरा फेज़ अभी भी जारी हैं, लेकिन ये आँकड़े रोज़गार के मोर्चे पर आईआईटी के मौजूदा परिदृश्य की एक बानगी तो पेश करते ही हैं। और यह काफी डरावना है, भयभीत करने वाला।
हालांकि कहा यह जा रहा है कि वैश्विक आर्थिक मंदी ने कंपनियों को हायरिंग कम करने और कम सैलरी पैकेज देने के लिए मजबूर कर दिया है। लेकिन पिछले कुछेक वर्षों से लगातार ऐसी ही स्थिति देखी जा रही है। यानी चुनौतियाँ न सिर्फ बरकरार हैं बल्कि बढ़ती ही जा रही हैं। शैक्षणिक वर्ष 2021-22 में आईआईटी भिलाई के 21 छात्र कैंपस प्लेसमेंट के माध्यम से नौकरी पाने में असफल रहे थे, 2022-23 में भी यह संख्या 18 रही। वेतन पैकेज की बात करें तो आईआईटी में औसत वेतन में भी गिरावट आई है। उदाहरणस्वरूप आईआईटी भिलाई में औसत वेतन 2022-23 में 14.48 लाख रुपये से गिरकर 2023-24 में 13.47 लाख रुपये हो गया।
इसी तरह, आईआईटी रूड़की में प्लेसमेंट प्रतिशत 2021-22 में 87.18% से गिरकर 2023-24 में 54.26% हो गया। बीटेक जैसे विशिष्ट कार्यक्रमों में जाने पर, प्लेसमेंट प्रतिशत हर साल अलग-अलग होता है। आईआईटी रूड़की में, बीटेक कार्यक्रमों के लिए प्रतिशत प्लेसमेंट 2021-22 में 96.34% से गिरकर 2023-24 में 65.89% हो गया, जो एक चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करता है।
बॉम्बे, खड़गपुर और दिल्ली समेत अलग-अलग आईआईटी में स्टूडेंट्स एक जैसी परेशानी से जूझ रहे हैं। हायरिंग कम होने की वजह से ग्रेजुएट स्टूडेंट्स के लिए नौकरी के अवसरों में भारी गिरावट आई है। जो कंपनियां कभी प्रमुख रिक्रूटर्स थीं, वे अब जॉब ऑफर करने में काफी कमी कर रही हैं। इस संकट ने स्टूडेंट्स को जॉब के बाकी ऑप्शन तलाशने के लिए मजबूर कर दिया है जैसे जॉब पोर्टल और ऑफ-कैंपस अवसर।
ये चुनौतियाँ नौकरी बाज़ार की गतिशीलता, आर्थिक कारकों और उद्योग की माँगों के बारे में व्यापक चर्चा की मांग करती हैं। विभिन्न क्षेत्रों पर COVID-19 महामारी के प्रभाव की भी वर्तमान प्लेसमेंट परिदृश्य में भूमिका हो सकती है। लेकिन ये चुनौतियां कौशल विकास, इंटर्नशिप और उद्योग सहयोग सहित करियर की तैयारी को लेकर समग्रता के महत्व को भी रेखांकित करती हैं। संस्थानों को रोज़गार बाजार के उभरते रुझानों और नियोक्ता की अपेक्षाओं के अनुरूप रणनीतियों को अपनाने की आवश्यकता को भी इससे बल मिलता है।
आईआईटी में प्लेसमेंट संकट की कहानी उच्च शिक्षा और रोजगार क्षेत्र की एक व्यापक तस्वीर पेश करती है, जहां शिक्षा और रोजगार के बीच के अंतर को पाटने के लिए रोजगार योग्य कौशल, करियर मार्गदर्शन और उद्योग-अकादमिक साझेदारी बढ़ाने पर विमर्श का एक आधार बनता है। हालांकि प्लेसमेंट परिणामों पर आर्थिक मंदी के प्रभाव को कम करने के लिए आईआईटी जैसे संस्थान जवाबी उपाय लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। उदाहरण के लिए पूर्व स्टूडेंट के नेटवर्क का फायदा उठाना, रिक्रूटर्स के बड़े स्पेक्ट्रम के साथ जुड़ना और कुछ सेक्टर्स के लिए प्लेसमेंट ड्राइव चलाना। लेकिन इसके बावजूद प्लेसमेंट को लेकर जो ज्वलंत सवाल उठ खड़े हुए हैं, उन पर गंभीरता से विमर्श और मनन की ज़रूरत है।




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