
विकास अर्थशास्त्रियों संतोष मेहरोत्रा और जजाति परिदा की नई किताब India Out of Work ने भारत की रोजगार स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। किताब का दावा है कि ऊंची आर्थिक विकास दर के आंकड़ों के पीछे रोजगार संकट, बढ़ती असमानता और युवाओं के घटते अवसरों जैसी समस्याएं छिपी हुई हैं।
लेखकों ने मजबूत आर्थिक सुधार और तेज विकास की धारणा को चुनौती देते हुए कहा है कि भारत के श्रम बाजार में “संरचनात्मक गिरावट” देखने को मिल रही है। किताब के सबसे चर्चित दावों में से एक यह है कि 2020 से 2024 के बीच करीब 8 करोड़ लोग दोबारा कृषि क्षेत्र में लौटे। लेखकों के मुताबिक, औद्योगिक विकास की दिशा में आगे बढ़ रही किसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए यह बेहद असामान्य स्थिति है।
संतोष मेहरोत्रा के अनुसार, इस अवधि में सरकार से जुड़े अर्थशास्त्रियों ने लगभग 8 करोड़ नए रोजगार बनने का जश्न मनाया, लेकिन इनमें से अधिकतर नौकरियां कृषि क्षेत्र में बनीं। यह ऐसा क्षेत्र है जहां पहले से ही जरूरत से ज्यादा श्रमिक हैं और उत्पादकता कम है।
किताब में कहा गया है कि भारत की आर्थिक वृद्धि अब तेजी से “K-शेप्ड ग्रोथ” का रूप ले रही है। यानी एक तरफ उच्च आय वर्ग को हाई-एंड सर्विस सेक्टर और पूंजी आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश का फायदा मिल रहा है, जबकि बड़ी आबादी की आय ठहरी हुई है और रोजगार की गुणवत्ता कमजोर हो रही है।
लेखकों ने चेतावनी दी है कि भारत रोजगार सृजन के मामले में “खोए हुए दशक” की ओर बढ़ सकता है। किताब के अनुसार, 2012 के बाद से युवा बेरोजगारी लगभग तीन गुना बढ़ चुकी है। वहीं करीब 12.1 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न पढ़ाई में हैं, न नौकरी में और न ही किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा हैं।
मेहरोत्रा का कहना है कि भारत के पास लगभग 2040 तक जनसांख्यिकीय लाभांश का अवसर मौजूद है, लेकिन गैर-कृषि क्षेत्रों में पर्याप्त रोजगार न बनने की वजह से यह अवसर तेजी से कमजोर हो रहा है। उन्होंने रोजगार की चुनौती झेल रहे तीन बड़े समूहों की पहचान की है — कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त श्रमिक, बेरोजगार युवा और हर साल श्रम बाजार में शामिल होने वाले करीब 60 लाख नए लोग।
किताब भारत की विनिर्माण नीति और औद्योगिक रणनीति पर भी तीखी टिप्पणी करती है। लेखकों के मुताबिक, देश की कुल आर्थिक गतिविधि में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी कई दशकों से लगभग स्थिर बनी हुई है। इतना ही नहीं, 2012 से 2019 के बीच इस क्षेत्र में रोजगार घटा, जो किसी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए असामान्य माना जाता है।
मेहरोत्रा का तर्क है कि रोजगार केंद्रित औद्योगिक नीति और मजबूत मैन्युफैक्चरिंग रणनीति के बिना भारत बड़े पैमाने पर गैर-कृषि नौकरियां और बेहतर वेतन वाले रोजगार पैदा नहीं कर सकता। उन्होंने पूर्वी एशियाई देशों और वियतनाम जैसे उदाहरणों का जिक्र किया, जहां विनिर्माण आधारित विकास ने व्यापक स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा किए।
महिलाओं के रोजगार को लेकर भी किताब में चिंता जताई गई है। आधिकारिक आंकड़े भले ही 2020 के बाद महिला श्रम भागीदारी में सुधार दिखाते हों, लेकिन मेहरोत्रा का कहना है कि इसका बड़ा हिस्सा महिलाओं के बिना वेतन वाले कृषि या पारिवारिक कामों में लौटने से जुड़ा है, न कि स्थायी और औपचारिक रोजगार मिलने से।
किताब के अनुसार, काम की तलाश छोड़ चुके लोगों में लगभग 96 प्रतिशत महिलाएं हैं। लेखकों का मानना है कि महिलाओं की भागीदारी को विनिर्माण और गैर-कृषि क्षेत्रों में बढ़ाना भारत के दीर्घकालिक आर्थिक बदलाव के लिए बेहद जरूरी है।
अर्थशास्त्रियों ने यह भी चेतावनी दी है कि शिक्षित बेरोजगारी, रुकी हुई मजदूरी, परीक्षा पेपर लीक और कमजोर सामाजिक सुरक्षा जैसी समस्याएं आने वाले वर्षों में सामाजिक तनाव बढ़ा सकती हैं। मेहरोत्रा ने कहा कि औद्योगिक क्षेत्रों जैसे गुरुग्राम, फरीदाबाद और नोएडा में श्रमिक विरोध और असंतोष के संकेत पहले से दिखने लगे हैं।
किताब भारत की GDP वृद्धि के आधिकारिक दावों पर भी सवाल उठाती है। लेखकों का कहना है कि 2016 के बाद असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ, लेकिन सरकारी आर्थिक अनुमानों में इन प्रभावों को पूरी तरह दर्ज नहीं किया गया। मेहरोत्रा ने हाल के वर्षों में भारत के राष्ट्रीय आय आंकड़ों को लेकर उठी अंतरराष्ट्रीय चिंताओं को भी लंबे समय से चली आ रही आर्थिक बहसों से जोड़ा है।
हालांकि किताब पूरी तरह निराशाजनक तस्वीर पेश नहीं करती। लेखकों का मानना है कि भारत अब भी दिशा बदल सकता है, अगर रोजगार केंद्रित औद्योगिक नीति अपनाई जाए, विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार किया जाए, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारी जाए और महिलाओं के रोजगार को मजबूत समर्थन दिया जाए।
किताब का मुख्य संदेश साफ है — सिर्फ आर्थिक विकास दर बढ़ना पर्याप्त नहीं है, जब तक उसका फायदा व्यापक और अर्थपूर्ण रोजगार सृजन के रूप में लोगों तक न पहुंचे।




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