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कैसे दिवालियापन तक पहुंची 22 अरब डॉलर की कंपनी Byju’s?

कैसे दिवालियापन तक पहुंची 22 अरब डॉलर की कंपनी Byju’s?

कैसे दिवालियापन तक पहुंची 22 अरब डॉलर की कंपनी Byju’s?

एक समय भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में BYJU’S को सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता था। कंपनी के संस्थापक Byju Raveendran को भारतीय स्टार्टअप संस्कृति का पोस्टर ब्वॉय कहा जाता था। छोटे शहर के एक शिक्षक से अरबपति बनने तक का उनका सफर लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा माना जाता था। लेकिन आज वही कंपनी भारी कर्ज, कानूनी विवादों और दिवालियापन के संकट में फंसी हुई है।

हाल ही में सिंगापुर की एक अदालत द्वारा अवमानना से जुड़े मामले में बायजू रवींद्रन को छह महीने की सजा सुनाए जाने की खबर ने इस पूरे मामले को फिर चर्चा में ला दिया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर 22 अरब डॉलर वैल्यूएशन तक पहुंचने वाली कंपनी इतनी तेजी से कैसे बिखर गई?

एक शिक्षक से देश के सबसे बड़े एडटेक उद्यमी तक का सफर

केरल के अझीकोड में जन्मे बायजू रवींद्रन के माता-पिता शिक्षक थे। उन्होंने शुरुआत में एक शिपिंग कंपनी में इंजीनियर के तौर पर काम किया। खाली समय में वे दोस्तों को CAT परीक्षा की तैयारी कराते थे। गणित और लॉजिकल सवालों को आसान तरीके से समझाने की उनकी शैली तेजी से लोकप्रिय हो गई।

धीरे-धीरे उनके क्लासरूम बड़े ऑडिटोरियम और स्टेडियम तक पहुंच गए। इसी लोकप्रियता को डिजिटल रूप देने के लिए उन्होंने 2015 में BYJU’S Learning App लॉन्च किया। मोबाइल आधारित शिक्षा प्लेटफॉर्म को छात्रों और अभिभावकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और कुछ ही वर्षों में कंपनी भारत की सबसे चर्चित एडटेक कंपनियों में शामिल हो गई।

कोरोना महामारी ने बदल दी कंपनी की किस्मत

BYJU’S की सबसे तेज ग्रोथ कोविड-19 महामारी के दौरान देखने को मिली। स्कूल बंद होने के बाद ऑनलाइन पढ़ाई अचानक जरूरत बन गई। इस दौर में लाखों नए यूजर्स प्लेटफॉर्म से जुड़े और विदेशी निवेशकों ने कंपनी में भारी निवेश किया।

तेजी से मिले फंड के दम पर कंपनी ने आक्रामक विस्तार शुरू किया। Aakash Educational Services, WhiteHat Jr और Great Learning जैसी कंपनियों का अधिग्रहण किया गया। इसके अलावा कंपनी ने खेल स्पॉन्सरशिप और बड़े विज्ञापन अभियानों पर भी भारी खर्च किया। उस समय BYJU’S को भारत के सबसे सफल स्टार्टअप मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा था।

फिर कहां से शुरू हुआ पतन?

विशेषज्ञों के मुताबिक कंपनी की सबसे बड़ी गलती यह थी कि उसने महामारी के दौरान मिली असाधारण ग्रोथ को स्थायी मान लिया। जैसे ही स्कूल दोबारा खुले, ऑनलाइन पढ़ाई की मांग में गिरावट आने लगी।

इसके साथ ही कंपनी की आक्रामक सेल्स रणनीति पर सवाल उठने लगे। कई अभिभावकों ने आरोप लगाया कि महंगे सब्सक्रिप्शन बेचने के लिए उन पर दबाव बनाया गया। कुछ मामलों में छात्रों के परिवारों को EMI और एजुकेशन लोन के जरिए कोर्स खरीदने के लिए प्रेरित किया गया, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर भी आलोचना हुई।

शिक्षा क्षेत्र में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। जब कंपनी की बिक्री रणनीति और सेवा गुणवत्ता पर सवाल बढ़े, तो उसकी छवि को गहरा नुकसान पहुंचा।

वित्तीय संकट और कानूनी विवादों ने बढ़ाई मुश्किलें

कंपनी के विस्तार की रफ्तार इतनी तेज थी कि खर्च लगातार बढ़ता गया। इसी बीच वित्तीय रिपोर्ट समय पर दाखिल नहीं हो सकीं। बाद में कंपनी के ऑडिटर Deloitte और कई बोर्ड सदस्यों के इस्तीफे ने निवेशकों की चिंता और बढ़ा दी।

सबसे बड़ा संकट तब सामने आया जब BYJU’S ने करीब 1.2 अरब डॉलर का विदेशी लोन लिया। विदेशी कर्जदाताओं ने आरोप लगाया कि कंपनी से जुड़ी बड़ी रकम विदेशी खातों में ट्रांसफर की गई। इसके बाद भारत और अमेरिका समेत कई देशों में कानूनी विवाद शुरू हो गए।

धीरे-धीरे कंपनी की वित्तीय स्थिति इतनी खराब हो गई कि कर्मचारियों की सैलरी, वेंडर पेमेंट और संचालन पर असर पड़ने लगा। एक समय कंपनी की वैल्यूएशन 22 अरब डॉलर बताई जाती थी, लेकिन बाद में खुद बायजू रवींद्रन ने स्वीकार किया कि कंपनी की वैल्यू लगभग शून्य रह गई है।

क्या अधिग्रहण की रणनीति उलटी पड़ गई?

महामारी के दौरान BYJU’S ने तेजी से कई कंपनियों का अधिग्रहण किया। शुरुआत में इसे आक्रामक और दूरदर्शी रणनीति माना गया, लेकिन बाद में यही विस्तार कंपनी के लिए बड़ी चुनौती बन गया।

अलग-अलग देशों, तकनीकों और शिक्षा श्रेणियों वाली कंपनियों को एक साथ संभालना आसान नहीं था। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी तेजी से बढ़ते कारोबार को नियंत्रित करने के लिए मजबूत प्रबंधन और वित्तीय अनुशासन जरूरी था, जिसकी कमी धीरे-धीरे सामने आने लगी।

इसके कारण लागत बढ़ती गई, संचालन जटिल होता गया और फैसले लेने की प्रक्रिया कमजोर पड़ने लगी।

क्या केवल संस्थापक जिम्मेदार हैं?

विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरी कहानी को केवल एक संस्थापक की विफलता के रूप में देखना सही नहीं होगा। महामारी के दौरान वैश्विक निवेशकों ने भी स्टार्टअप्स पर तेजी से विस्तार करने का भारी दबाव बनाया था।

उस दौर में मुनाफे से ज्यादा तेजी से ग्रोथ हासिल करना सफलता का पैमाना माना जा रहा था। निवेशकों ने कंपनियों को तेजी से विस्तार, बड़े अधिग्रहण और आक्रामक मार्केटिंग के लिए प्रोत्साहित किया। बाद में वही मॉडल कई स्टार्टअप्स के लिए संकट का कारण बन गया।

BYJU’S का मामला इस बात का उदाहरण माना जा रहा है कि केवल भारी फंडिंग और ऊंची वैल्यूएशन किसी कंपनी की स्थायी सफलता की गारंटी नहीं होती।

स्टार्टअप दुनिया के लिए क्या हैं बड़े सबक?

BYJU’S का पतन भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए कई महत्वपूर्ण संकेत छोड़ गया है। पहला, कागजी वैल्यूएशन और वास्तविक कारोबार में बड़ा अंतर हो सकता है। दूसरा, तेज ग्रोथ की दौड़ में वित्तीय अनुशासन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस की अनदेखी लंबे समय में खतरनाक साबित हो सकती है।

यह कंपनी एक झटके में नहीं गिरी, बल्कि अत्यधिक विस्तार, बढ़ते कर्ज, कमजोर वित्तीय नियंत्रण और जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास ने धीरे-धीरे इसे संकट में धकेल दिया।

आज BYJU’S की कहानी भारतीय स्टार्टअप जगत के लिए केवल एक कारोबारी विफलता नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ती डिजिटल कंपनियों के लिए चेतावनी भी मानी जा रही है।

Asmita Sarkar

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