
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने गुरुवार को कहा कि आने वाले वर्षों में देश की नीतियों का आधार केवल राजनीति नहीं, बल्कि एक व्यापक विकास दृष्टि होगी—SIR, यानी Sustainable, Inclusive और Rapid Growth। वे कोझिकोड में आयोजित एम. पी. वीरेंद्रकुमार स्मृति व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे, जहां उन्होंने कहा कि चाहे केंद्र में कोई भी सरकार हो, भारत को अगले 10 से 15 वर्षों में तीन प्रमुख चुनौतियों का समाधान ढूंढना ही होगा।
रमेश ने विस्तार से समझाया कि ‘S’ का अर्थ टिकाऊ विकास है—ऐसा विकास जो पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ आगे बढ़े। ‘I’ का मतलब समावेशी विकास है, ताकि प्रगति का लाभ कुछ लोगों तक सीमित न रहकर समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। और ‘R’ से आशय तेज आर्थिक वृद्धि है, जो हर साल रोजगार बाजार में आने वाले 70–80 लाख युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर तैयार कर सके।
उन्होंने कहा कि आने वाले दशक में किसी भी सरकार के लिए तीन मुद्दे अनिवार्य होंगे—विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन, आर्थिक असमानता को कम करना, और तेजी से बढ़ती कार्यबल की जरूरतों को पूरा करने लायक रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था तैयार करना।
तीन दशक पुरानी यादें और ‘डबल एमपी’ वाला किस्सा
अपने संबोधन में जयराम रमेश ने वीरेंद्रकुमार के साथ अपनी करीब 30 साल पुरानी जान-पहचान को भी याद किया। उन्होंने बताया कि उनकी पहली मुलाकात तब हुई थी जब वीरेंद्रकुमार केंद्र में वित्त राज्य मंत्री बने थे। रमेश ने हंसते हुए कहा कि वीरेंद्रकुमार खुद को अक्सर ‘डबल एमपी’ कहा करते थे, क्योंकि उनके नाम का पहला अक्षर भी ‘एमपी’ से ही शुरू होता था।
समाजवादी परंपरा और उसके विघटन की चर्चा
अपने भाषण में रमेश ने भारतीय समाजवादी परंपरा पर भी बात की और जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसी ऐतिहासिक हस्तियों को याद किया।
उन्होंने कहा कि समाजवादियों के बारे में मजाक में कहा जाता है कि वे “न छह महीने साथ रह सकते हैं और न छह महीने अलग”; इसी कारण यह आंदोलन कई हिस्सों में बंटा—कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से लेकर जेडी(यू) जैसे कई राजनीतिक स्वरूपों तक। रमेश के अनुसार, समाजवादी विचारधारा सत्ता से ज्यादा मूल्यों और संघर्ष के लिए जानी जाती थी, लेकिन यह परंपरा अब धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।
भारत की विविधता—संविधान की सबसे बड़ी देन
रमेश ने अपने भाषण के अंत में भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता की विशेषता पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता विश्व में अनोखी है और यही देश को मजबूती देती है।
उन्होंने सोवियत संघ और यूगोस्लाविया का उदाहरण देते हुए कहा कि विविधता के बावजूद वे देश टिक नहीं सके, जबकि भारत इसलिए स्थिर है क्योंकि संविधान न केवल विविधता का सम्मान करता है बल्कि उसका उत्सव भी मनाता है।
रमेश ने कहा कि वीरेंद्रकुमार का जीवन भी इसी विचार का प्रतीक था—विविधता को स्वीकार करना, संवाद को महत्व देना और हर आवाज़ को जगह देना। उन्होंने इसे भारत के भविष्य के लिए भी सबसे बड़ी जरूरत बताया।




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