
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। यहां सैकड़ों भाषाएं, बोलियां, परंपराएं और संस्कृतियां एक साथ सांस लेती हैं। ऐसे देश में अगर कोई शिक्षा नीति छात्रों को एक से अधिक भारतीय भाषाओं से परिचित कराने की कोशिश करती है, तो उसे केवल एक शैक्षणिक बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता के एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। यही वजह है कि नई शिक्षा नीति 2020 के तहत त्रिभाषा फॉर्मूले को लागू करने की दिशा में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई (CBSE) का कदम स्वागत योग्य माना जाना चाहिए।
हालांकि, इस निर्णय के सामने आते ही विरोध के स्वर भी सुनाई देने लगे हैं। कुछ शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों ने इसे अदालत में चुनौती देते हुए छात्रों और स्कूलों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाने वाला फैसला बताया है। सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल इस पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन केंद्र सरकार और यानी सीबीएसई से जवाब जरूर मांगा है। यह कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में तीन भाषाएं सीखना छात्रों के लिए बोझ है या फिर यह उन्हें अधिक सक्षम और व्यापक दृष्टिकोण वाला नागरिक बनाने की दिशा में एक निवेश है?
दरअसल, त्रिभाषा फॉर्मूला कोई नया विचार नहीं है। इसकी नींव छह दशक पहले रखी गई थी। प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षा सुधारक दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता वाले कोठारी आयोग ने यह सुझाव दिया था कि भारत जैसे बहुभाषी देश में छात्रों को अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं से भी परिचित कराया जाना चाहिए। आयोग का मानना था कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समझ और राष्ट्रीय एकता का पुल भी है।
इसी सोच को 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया गया और बाद में 1986 की शिक्षा नीति में भी इसे बरकरार रखा गया। नई शिक्षा नीति 2020 ने उसी विचार को आधुनिक संदर्भ में फिर से सामने रखा है। इसका उद्देश्य किसी एक भाषा को थोपना नहीं, बल्कि बहुभाषिकता को बढ़ावा देना है ताकि छात्र विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों को समझ सकें।
त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर सबसे अधिक आशंकाएं दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में दिखाई देती रही हैं। वहां यह तर्क दिया जाता है कि यह व्यवस्था हिंदी को बढ़ावा देने और क्षेत्रीय भाषाओं की पहचान को कमजोर करने का माध्यम बन सकती है। इन चिंताओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि भाषा भारत में केवल संवाद का विषय नहीं, बल्कि पहचान और संस्कृति का भी सवाल है। लेकिन यह भी सच है कि नई व्यवस्था में छात्रों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किसी भी भारतीय भाषा को चुनने की स्वतंत्रता दी गई है।
असल चुनौती नीति में नहीं, उसके क्रियान्वयन में है। लंबे समय तक उत्तर भारत के अधिकांश स्कूलों में तीसरी भाषा के रूप में किसी अन्य भारतीय भाषा के बजाय संस्कृत को प्राथमिकता दी जाती रही। इससे दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने और समझने का अवसर सीमित रह गया। यदि अब त्रिभाषा फॉर्मूले को सही भावना के साथ लागू करना है, तो उत्तर भारत के स्कूलों को तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम जैसी भाषाओं को भी विकल्प के रूप में उपलब्ध कराना होगा। इससे भाषाई संतुलन बनेगा और यह संदेश जाएगा कि भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान एकतरफा नहीं, बल्कि पारस्परिक है।
छात्रों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने का तर्क भी पूरी तरह ठोस नहीं लगता। आज देश के कई निजी और महानगरीय स्कूलों में फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश और जापानी जैसी विदेशी भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं। ऐसे में यदि छात्रों को किसी अन्य भारतीय भाषा को सीखने का अवसर मिलता है, तो इसे बोझ नहीं बल्कि ज्ञान और सांस्कृतिक समझ का विस्तार माना जाना चाहिए।
भाषाएं केवल शब्दों का संग्रह नहीं होतीं। वे इतिहास, संस्कृति, लोक परंपराओं और समाज की सामूहिक स्मृतियों को अपने भीतर समेटे रहती हैं। किसी भाषा को सीखना दरअसल उस समाज को समझने की दिशा में पहला कदम होता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह समझ और भी जरूरी हो जाती है।
आज जब क्षेत्रीय पहचान और भाषाई राजनीति कई बार राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करती है, तब ऐसी पहलें लोगों के बीच संवाद और समझ बढ़ाने का माध्यम बन सकती हैं। यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि यदि उत्तर भारत का एक छात्र तमिल साहित्य से परिचित हो और दक्षिण भारत का छात्र हिंदी या बंगाली साहित्य को समझे, तो दोनों के बीच सांस्कृतिक दूरी स्वतः कम हो जाएगी।
त्रिभाषा फॉर्मूला केवल भाषाएं सिखाने की योजना नहीं है। यदि इसे सही भावना और संतुलित तरीके से लागू किया जाए, तो यह भारत की भाषाई विविधता को संरक्षित करने के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत कर सकता है। इसलिए इस बहस को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीय समरसता के व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है।
भारत की अगली पीढ़ी जितनी अधिक भाषाओं को समझेगी, उतनी ही बेहतर तरीके से वह भारत को भी समझ पाएगी। और शायद यही त्रिभाषा फॉर्मूले का सबसे बड़ा उद्देश्य है।




Add comment