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CBSE की नई तीन-भाषा नीति सुप्रीम कोर्ट पहुंची, कक्षा 9 में दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य करने के फैसले को चुनौती

CBSE की नई तीन-भाषा नीति सुप्रीम कोर्ट पहुंची, कक्षा 9 में दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य करने के फैसले को चुनौती

CBSE की नई तीन-भाषा नीति सुप्रीम कोर्ट पहुंची, कक्षा 9 में दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य करने के फैसले को चुनौती

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की नई तीन-भाषा नीति को लेकर विवाद गहरा गया है। कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए 1 जुलाई 2026 से कम से कम दो भारतीय भाषाओं सहित तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य करने के बोर्ड के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह निर्णय जल्दबाजी में लिया गया है और इससे छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव बढ़ सकता है।

महाराष्ट्र की पूर्व मंत्री और शिक्षाविद डॉ. फौजिया खान ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर CBSE के 15 मई 2026 के परिपत्र को रद्द करने की मांग की है। उन्होंने अदालत से इस नई व्यवस्था के क्रियान्वयन पर रोक लगाने का भी अनुरोध किया है।

क्या है पूरा मामला?

CBSE ने 15 मई 2026 को जारी अपने परिपत्र में कहा था कि 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 के सभी विद्यार्थियों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा। इनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होना अनिवार्य होंगी। यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF-SE 2023) के अनुरूप लागू की जा रही है।

बोर्ड का तर्क है कि बहुभाषी शिक्षा छात्रों की भाषाई क्षमता बढ़ाने, भारतीय भाषाओं के संरक्षण और समग्र सीखने की प्रक्रिया को मजबूत करने में मदद करेगी। इसके लिए स्कूलों को स्थानीय साहित्य, कहानियों, कविताओं और अन्य रचनात्मक सामग्री को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की सलाह दी गई है।

याचिका में क्या उठाए गए सवाल?

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि CBSE स्वयं अपने परिपत्र में शिक्षकों की कमी की बात स्वीकार कर चुका है, इसके बावजूद नई व्यवस्था को अनिवार्य बनाया जा रहा है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इससे कई राज्यों में व्यावहारिक समस्याएं खड़ी होंगी।

याचिका में यह भी कहा गया है कि दक्षिण भारत और अन्य गैर-हिंदी भाषी राज्यों में यह व्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी को अनिवार्य बनाने का माध्यम बन सकती है, जबकि उत्तर भारत के कई राज्यों में संस्कृत को बढ़ावा देने का दबाव बन सकता है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इसके पीछे स्पष्ट शैक्षणिक आधार नहीं दिखाई देता।

गैर-हिंदी राज्यों में बढ़ी चिंता

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) से जुड़ी डॉ. फौजिया खान का कहना है कि किसी भी राज्य के छात्रों पर हिंदी या संस्कृत जैसी किसी विशेष भाषा को अनिवार्य रूप से थोपना राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की मूल भावना के विपरीत है। उनका तर्क है कि NEP 2020 छात्रों और राज्यों को भाषाओं के चयन में पर्याप्त लचीलापन देने की बात करती है।

भाषा नीति को लेकर दक्षिण भारत के कुछ राज्यों और कई शिक्षा विशेषज्ञों ने भी पहले चिंता जताई है। उनका मानना है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले राज्यों, शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों के साथ व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी।

केंद्र और CBSE से मांगा गया जवाब

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही संज्ञान ले चुका है। 27 मई 2026 को अदालत ने केंद्र सरकार और CBSE को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। अब इस मुद्दे पर अदालत में आगे सुनवाई होगी, जिस पर देशभर के लाखों छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों की नजरें टिकी हुई हैं।

विदेशी भाषा चुनने के लिए भी नई शर्त

CBSE के परिपत्र के अनुसार यदि कोई छात्र फ्रेंच, जर्मन, जापानी या किसी अन्य विदेशी भाषा का अध्ययन करना चाहता है, तो उसे पहले दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन करना होगा। इसके बाद ही विदेशी भाषा को तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में चुना जा सकेगा।

बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था को लागू करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। इनमें अध्ययन सामग्री के चयन, शिक्षण पद्धति और मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं को शामिल किया जाएगा।

पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता तक अंतरिम व्यवस्था

CBSE ने कहा है कि जिन भाषाओं की नई पाठ्यपुस्तकें अभी उपलब्ध नहीं हैं, वहां छात्र अस्थायी रूप से उसी भाषा की कक्षा 6 की पुस्तकों के 2026-27 संस्करण का उपयोग कर सकेंगे। बोर्ड का कहना है कि यह व्यवस्था केवल संक्रमण काल के लिए होगी, ताकि छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?

यह मामला केवल भाषा शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की शिक्षा नीति, भाषाई विविधता और राज्यों के अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। एक ओर सरकार और CBSE बहुभाषी शिक्षा को भविष्य की जरूरत बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई शिक्षाविद और राजनीतिक दल इसे लागू करने के तरीके पर सवाल उठा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का आगामी फैसला न केवल CBSE स्कूलों बल्कि देश में भाषा शिक्षा की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

Asmita Sarkar

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