
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दोनों सरकारों को नोटिस जारी किया और राज्य में आरटीई कानून के पालन की स्थिति पर विस्तृत जानकारी मांगी है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि पंजाब में पिछले कई वर्षों से आरटीई अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधानों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। विशेष रूप से निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूहों के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की व्यवस्था के पालन पर सवाल उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उनके पास ऐसे निजी स्कूलों की कोई सूची या जानकारी है जो कानून के प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि आरोपों को साबित करने के लिए क्या कोई ठोस आंकड़े या सर्वेक्षण उपलब्ध हैं।
याचिकाकर्ता, जिन्होंने स्वयं अदालत में अपना पक्ष रखा, ने दावा किया कि पंजाब में आरटीई कानून को लागू करने में गंभीर खामियां रही हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2012 के उस ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें शिक्षा का अधिकार कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया था और निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था को मान्यता दी गई थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पहले दाखिल किए गए एक हलफनामे का भी जिक्र हुआ। इसमें बताया गया था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के 450 से अधिक छात्रों को निजी स्कूलों में प्रवेश दिलाया गया है। हालांकि याचिकाकर्ता ने इस संख्या को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार हर साल प्रवेश स्तर पर लगभग दो लाख बच्चों का दाखिला होता है, ऐसे में लाभार्थियों की संख्या कहीं अधिक होनी चाहिए थी।
इन दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने मामले में औपचारिक नोटिस जारी करते हुए केंद्र और पंजाब सरकार से जवाब मांगा। साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वह किसी एक जिले में विस्तृत सर्वेक्षण कर यह जानकारी जुटाएं कि वहां कितने निजी स्कूल संचालित हैं और उनमें से कितने स्कूल आरटीई के प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं।
जब याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी थी, तब अदालत ने टिप्पणी की कि कई बार आरटीआई के जवाब पूछे गए प्रश्नों की प्रकृति के अनुसार सीमित होते हैं और वे पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाते।
याचिका में क्या हैं प्रमुख मांगें?
याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह पंजाब में आरटीई अधिनियम की धारा 12(1)(c) के अनुपालन की निगरानी के लिए एक पारदर्शी, समयबद्ध और सत्यापन योग्य व्यवस्था स्थापित करे। याचिकाकर्ता ने सार्वजनिक डैशबोर्ड जैसी प्रणाली विकसित करने की भी मांग की है, जिससे आरक्षित सीटों, प्रवेश प्रक्रिया और लाभार्थी छात्रों की जानकारी आम लोगों के लिए उपलब्ध हो सके।
याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य स्तर पर उपलब्ध सीटों का स्पष्ट निर्धारण और प्रकाशन किया जाए, प्रवेश कार्यक्रम समय पर जारी हो, आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाया जाए और निजी स्कूलों को मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि की व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। इसके अलावा नियमों के उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही तय करने और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।
क्या कहती है आरटीई अधिनियम की धारा 12(1)(c)?
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को प्रवेश स्तर की कक्षा में कम से कम 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और वंचित समूहों के बच्चों के लिए आरक्षित रखनी होती हैं। इन छात्रों को प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना स्कूलों की कानूनी जिम्मेदारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया था, ताकि कमजोर वर्गों के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुंच मिल सके।
अब इस मामले में केंद्र और पंजाब सरकार के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई करेगा। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों की नजर इस मामले पर बनी हुई है, क्योंकि इसका प्रभाव राज्य में आरटीई कानून के क्रियान्वयन और लाखों बच्चों के शिक्षा अधिकार से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।




Add comment