
भारत में उच्च शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उद्देश्यों के अनुरूप अब विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान बहुविषयक (मल्टीडिसिप्लिनरी) शिक्षा, नवाचार और रचनात्मक कौशल पर अधिक जोर दे रहे हैं। इसी दिशा में मुंबई स्थित आईएसडीआई स्कूल ऑफ डिजाइन एंड इनोवेशन (ISDI School of Design & Innovation), एटलस स्किलटेक यूनिवर्सिटी (ATLAS SkillTech University) जैसे संस्थान ऐसे एकीकृत शैक्षणिक मॉडल अपना रहे हैं, जिनमें डिजाइन, टेक्नोलॉजी और बिजनेस शिक्षा को एक साथ जोड़कर छात्रों को उद्योग की जरूरतों के अनुसार तैयार किया जा रहा है।
शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी नई शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों को पारंपरिक विषयों की सीमाओं से आगे बढ़कर ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जो छात्रों में रचनात्मक सोच, समस्या समाधान की क्षमता और उद्यमिता को बढ़ावा दे।
डिजाइन शिक्षा पर बढ़ता फोकस ऐसे समय में देखने को मिल रहा है, जब भारत की क्रिएटिव इंडस्ट्री की आर्थिक क्षमता पर भी व्यापक चर्चा हो रही है। एशियाई विकास बैंक (ADB) की वर्ष 2022 की रिपोर्ट Creative India: Tapping the Full Potential के अनुसार, भारत में रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़े पेशे देश के कुल रोजगार का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा हैं और सकल मूल्य संवर्धन (Gross Value Added) में लगभग 20 प्रतिशत योगदान देते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अपार संभावनाओं के बावजूद भारत के सांस्कृतिक और रचनात्मक क्षेत्र का अभी पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाया है। ऐसे में आईएसडीआई मुंबई जैसे संस्थान डिजाइन शिक्षा को रचनात्मक प्रतिभा, नवाचार और आर्थिक विकास के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में विकसित कर रहे हैं।
भारत की क्रिएटिव इकोनॉमी भी लगातार विस्तार कर रही है। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा वर्ष 2025 में जारी उद्योग आधारित आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये (2.5 ट्रिलियन रुपये) का था और इस क्षेत्र से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से एक करोड़ (10 मिलियन) से अधिक लोगों को रोजगार मिला।
इसी पृष्ठभूमि में कई उच्च शिक्षण संस्थानों ने डिजाइन, बिजनेस और टेक्नोलॉजी को एक साथ जोड़ने वाले शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू किए हैं। इनमें आईएसडीआई मुंबई भी शामिल है, जिसका अकादमिक मॉडल न्यूयॉर्क स्थित पार्सन्स स्कूल ऑफ डिजाइन (Parsons School of Design) के सहयोग से विकसित किया गया है।
संस्थान ने पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प को आधुनिक डिजाइन शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से भी कई पहल की हैं। NAQSHE-KAAM पहल और दिल्ली के लाल किले स्थित आत्मनिर्भर भारत सेंटर ऑफ डिजाइन के सहयोग से छात्रों ने विभिन्न कारीगर समुदायों के साथ काम करते हुए पारंपरिक हस्तशिल्प के आधुनिक उपयोगों पर अध्ययन किया। इस पहल के तहत तैयार की गई ‘रूट्स ऑफ लाइट’ (Roots of Light) नामक इंस्टॉलेशन ने यह दिखाया कि पारंपरिक शिल्पकला और आधुनिक डिजाइन को किस तरह जोड़कर आज के समय के लिए नए समाधान तैयार किए जा सकते हैं।
डिजाइन और टेक्नोलॉजी का यह मेल छात्रों की नवाचार परियोजनाओं में भी दिखाई देता है। आईएसडीआई मुंबई के अनुसार, छात्रों द्वारा विकसित ‘भृंग (Bhrung)’ नामक स्वायत्त रक्षा रोवर (Autonomous Defence Rover) को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) से 14 लाख रुपये का अनुदान मिला। वहीं, ऊंची इमारतों के शीशों की सफाई के लिए तैयार किए गए स्वायत्त रोबोट ‘ग्लासबॉट (Glassbot)’ को सरकार की ओर से 4.2 लाख रुपये की वित्तीय सहायता प्राप्त हुई।
आज डिजाइन शिक्षा में वैश्विक अनुभव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आईएसडीआई मुंबई के अनुसार, उसके फैशन डिजाइन कार्यक्रम के 21 छात्रों ने इस वर्ष पेरिस फैशन वीक में अपने डिजाइन प्रदर्शित किए। इसके अलावा संस्थान के छात्र टोक्यो फैशन वीक और वोग फोर्सेज ऑफ फैशन (Vogue Forces of Fashion) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बदलाव उद्योग जगत की बदलती जरूरतों को दर्शाते हैं। नई शिक्षा नीति 2020 के अनुसार, भविष्य के स्नातकों को केवल तकनीकी ज्ञान ही नहीं, बल्कि रचनात्मक सोच, आलोचनात्मक विश्लेषण (क्रिटिकल थिंकिंग) और उद्यमिता जैसी क्षमताओं की भी आवश्यकता होगी, ताकि वे तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धी बने रह सकें।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहे भारत में उच्च शिक्षा के भीतर डिजाइन, टेक्नोलॉजी, बिजनेस और सांस्कृतिक ज्ञान का बढ़ता एकीकरण इस बात का संकेत है कि देश के शिक्षण संस्थान अब छात्रों को भविष्य की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के लिए अधिक व्यापक और व्यावहारिक तरीके से तैयार करने की दिशा में काम कर रहे हैं।




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