
जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों की कमी और बढ़ती उत्पादन लागत के बीच वैश्विक खाद्य उद्योग तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जिन कृषि अवशेषों (Agricultural Byproducts) को कभी बेकार समझकर फेंक दिया जाता था, वे आज कंपनियों के लिए नए कारोबार और आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनते जा रहे हैं। दुनिया भर की एग्री-फूड कंपनियां अब सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) मॉडल को अपनाते हुए कृषि अपशिष्ट को उपयोगी उत्पादों में बदल रही हैं। इससे न केवल पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव कम हो रहा है, बल्कि कंपनियों को नए व्यावसायिक अवसर भी मिल रहे हैं।
कई वर्षों तक कृषि प्रसंस्करण उद्योग पारंपरिक रैखिक (Linear) मॉडल पर काम करता रहा। इस मॉडल में फसल की कटाई, प्रसंस्करण और उसके बाद बची हुई सामग्री का निपटान कर दिया जाता था। लेकिन अब टिकाऊ विकास (Sustainability) और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) की बढ़ती जरूरत ने कंपनियों की सोच बदल दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बादाम के छिलके, संतरे और अन्य खट्टे फलों के छिलके, पिस्ता के खोल तथा कृषि प्रसंस्करण के दौरान निकलने वाले अन्य अवशेष अब कचरा नहीं माने जाते। इनका उपयोग अब बायो-आधारित प्लास्टिक, कॉस्मेटिक उत्पादों के घटक, पोषणयुक्त खाद्य पदार्थ (Functional Foods) और विशेष प्रकार के पशु आहार जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पाद बनाने में किया जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण के साथ बढ़ रहा कारोबार
यह बदलाव केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपनियों की व्यावसायिक रणनीति का भी अहम हिस्सा बन चुका है। कृषि अवशेषों से अतिरिक्त मूल्य पैदा कर कंपनियां महंगे कच्चे माल पर अपनी निर्भरता कम कर रही हैं और उत्पादन लागत को नियंत्रित करते हुए लाभ बढ़ाने में सफल हो रही हैं।
भारत में भी बढ़ रहा सर्कुलर एग्रीकल्चर का दायरा
भारत की कई बड़ी एग्रीबिजनेस कंपनियां भी अपने संचालन में सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल को शामिल कर चुकी हैं।
आईटीसी लिमिटेड (ITC Limited) अपने पेपरबोर्ड्स एंड स्पेशियलिटी पेपर्स डिवीजन में गेहूं के भूसे और गन्ने की खोई (बैगास) जैसे कृषि अवशेषों का उपयोग कागज बनाने में करती है। इससे लकड़ी के गूदे (Virgin Wood Pulp) पर निर्भरता कम होती है और फसल अवशेषों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होता है।
इसी तरह गोदरेज एग्रोवेट (Godrej Agrovet) ऑयल पाम और पोल्ट्री उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट का उपयोग पशु आहार के घटकों और जैविक उर्वरक बनाने में करती है। कंपनी का उद्देश्य उत्पादन प्रक्रिया के हर चरण से अधिकतम मूल्य प्राप्त करना है।
वहीं, देश की प्रमुख पोल्ट्री कंपनी सुगुना फूड्स (Suguna Foods) ने भी क्लोज्ड-लूप सिस्टम अपनाया है। इसके तहत जैविक उत्पादन अपशिष्ट को उच्च प्रोटीन युक्त पशु आहार और विशेष पोल्ट्री फैट में बदला जाता है, जिससे पशु आहार तैयार करने की लागत कम होती है।
चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं
हालांकि सर्कुलर एग्रीकल्चर मॉडल के आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ स्पष्ट हैं, लेकिन इसे बड़े स्तर पर लागू करना अभी भी आसान नहीं है। कृषि अवशेष मौसमी होते हैं, जल्दी खराब हो सकते हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में फैले रहते हैं। ऐसे में इनके संग्रह, भंडारण और प्रसंस्करण के लिए मजबूत व्यवस्था विकसित करना जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती किसानों से मिलने वाले असमान उत्पादन और उद्योगों की मानकीकृत मांग के बीच संतुलन बनाना है। मौसम में बदलाव, फसल उत्पादन और गुणवत्ता में उतार-चढ़ाव के कारण लगातार एक जैसी आपूर्ति बनाए रखना कठिन हो जाता है।
भविष्य में बढ़ेगा निवेश
आने वाले वर्षों में कृषि प्रौद्योगिकी, अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली और वैकल्पिक कच्चे माल के विकास में निवेश बढ़ने की संभावना है। हालांकि जैविक नवाचारों को विकसित करने में कई वर्षों का शोध, परीक्षण और नियामकीय मंजूरी की आवश्यकता होती है, लेकिन उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि अपशिष्ट का प्रभावी उपयोग भविष्य में एग्रीबिजनेस कंपनियों के लिए सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी लाभ साबित हो सकता है।
वैश्विक खाद्य प्रणाली पर बढ़ते संसाधन संकट के बीच जो कंपनियां कृषि अपशिष्ट को उपयोगी उत्पादों और नए व्यवसाय में बदलने में सफल होंगी, वही आने वाले समय में एग्री-फूड उद्योग का नेतृत्व करेंगी।




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