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विदेश में पढ़ाई: क्यों अमेरिका से लौट रहे हैं हजारों भारतीय छात्र? जानिए किन देशों की ओर बढ़ रहा है रुझान

विदेश में पढ़ाई: क्यों अमेरिका से लौट रहे हैं हजारों भारतीय छात्र? जानिए किन देशों की ओर बढ़ रहा है रुझान

विदेश में पढ़ाई: क्यों अमेरिका से लौट रहे हैं हजारों भारतीय छात्र? जानिए किन देशों की ओर बढ़ रहा है रुझान

एक समय था जब अमेरिका में पढ़ाई करना भारतीय छात्रों के लिए सफलता, बेहतर करियर और वैश्विक अवसरों का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। बढ़ती पढ़ाई की लागत, सख्त वीजा और इमिग्रेशन नियम, नौकरी को लेकर बढ़ती अनिश्चितता और आर्थिक दबाव के कारण बड़ी संख्या में भारतीय छात्र अमेरिका की बजाय दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं।

हालिया आंकड़े भी इसी बदलाव की ओर इशारा करते हैं। जून 2025 में अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की संख्या लगभग 3.82 लाख थी, जो जून 2026 तक घटकर करीब 3.52 लाख रह गई। यानी एक साल में लगभग 30 हजार छात्रों की कमी दर्ज की गई। यह गिरावट बताती है कि विदेश में उच्च शिक्षा को लेकर भारतीय छात्रों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं।

अमेरिका क्यों खो रहा है भारतीय छात्रों का भरोसा?

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका में पढ़ाई का सपना अब पहले जितना आसान और सुरक्षित नहीं रह गया है। पिछले कुछ वर्षों में छात्र वीजा प्रक्रिया अधिक लंबी और जटिल हुई है। कई छात्रों को वीजा इंटरव्यू की तारीख मिलने में कई महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। कुछ मामलों में यह अवधि 10 से 11 महीने तक पहुंचने की बात भी सामने आई है। इसका सीधा असर छात्रों के एडमिशन और शैक्षणिक सत्र पर पड़ता है।

इसके अलावा, अमेरिकी इमिग्रेशन नीतियों में आई सख्ती ने भी विदेशी छात्रों की चिंताएं बढ़ाई हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के दौरान इमिग्रेशन नियमों को लेकर अपनाए गए कड़े रुख और उसके बाद बनी अनिश्चितता का असर अब भी अंतरराष्ट्रीय छात्रों के फैसलों में दिखाई दे रहा है।

पढ़ाई के बाद नौकरी मिलना भी आसान नहीं

अमेरिका में पढ़ाई करने वाले अधिकतर भारतीय छात्र बड़ी उम्मीदों और भारी एजुकेशन लोन के साथ वहां पहुंचते हैं। पहले पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी मिलने और लंबे समय तक अमेरिका में काम करने की संभावनाएं अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती थीं।

हालांकि अब स्थिति बदल रही है। टेक सेक्टर सहित कई क्षेत्रों में भर्ती की रफ्तार धीमी हुई है, जबकि वर्क वीजा और स्पॉन्सरशिप की प्रक्रिया भी पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। ऐसे में कई छात्रों को अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी नहीं मिल पा रही है। इसका सीधा असर उनके आर्थिक भविष्य और एजुकेशन लोन चुकाने की क्षमता पर पड़ता है।

बढ़ती लागत भी बन रही बड़ी वजह

अमेरिका दुनिया के सबसे महंगे शिक्षा केंद्रों में शामिल है। विश्वविद्यालयों की ट्यूशन फीस, रहने का खर्च, स्वास्थ्य बीमा और अन्य दैनिक खर्च पहले से ही काफी अधिक हैं। इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने भारतीय छात्रों और उनके परिवारों पर आर्थिक दबाव और बढ़ा दिया है।

ऐसे में कई परिवार अब ऐसे देशों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जहां कम खर्च में अच्छी शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध हों।

यूरोप बन रहा है नया पसंदीदा विकल्प

अमेरिका से हटकर अब भारतीय छात्रों का रुझान यूरोपीय देशों की ओर तेजी से बढ़ रहा है। खासकर जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड्स भारतीय छात्रों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं।

जर्मनी में भारतीय छात्रों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। 2023 में जहां वहां करीब 29 हजार भारतीय छात्र थे, वहीं अब यह संख्या लगभग 60 हजार तक पहुंचने का अनुमान है।

इन देशों की लोकप्रियता के पीछे कई कारण हैं। यहां छात्र वीजा प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल और तेज मानी जाती है। पढ़ाई पूरी होने के बाद छात्रों को नौकरी तलाशने और काम करने के लिए पर्याप्त समय मिलता है। इससे उन्हें करियर शुरू करने और एजुकेशन लोन चुकाने में आसानी होती है।

इसके अलावा जर्मनी और फ्रांस की कई सरकारी विश्वविद्यालयों में ट्यूशन फीस बेहद कम या कई मामलों में निःशुल्क होती है। अमेरिका की तुलना में रहने और रोजमर्रा का खर्च भी कम पड़ता है। यही कारण है कि भारतीय परिवार अब यूरोप को अधिक सुरक्षित और किफायती विकल्प के रूप में देख रहे हैं।

कनाडा में भी घटा विदेशी छात्रों का आकर्षण

सिर्फ अमेरिका ही नहीं, कनाडा भी विदेशी छात्रों के लिए पहले जितना आकर्षक नहीं रह गया है। कनाडा सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों के बाद नए स्टडी परमिट में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है। इससे भारतीय छात्रों सहित कई अंतरराष्ट्रीय छात्र अब अन्य देशों के विकल्प तलाश रहे हैं।

क्या अमेरिका खो देगा अपना सबसे बड़ा छात्र बाजार?

उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहा तो आने वाले समय में और अधिक भारतीय छात्र अमेरिका की बजाय यूरोप और अन्य देशों का चयन कर सकते हैं। भारतीय छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों के लिए न केवल शैक्षणिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

अब छात्रों की सोच भी बदल रही है। केवल प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का नाम ही निर्णय का आधार नहीं रह गया है। कम खर्च, बेहतर रोजगार की संभावना, आसान वीजा प्रक्रिया और सुरक्षित भविष्य जैसे पहलू पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। यही बदलाव वैश्विक उच्च शिक्षा बाजार की नई दिशा तय करता दिखाई दे रहा है।

निष्कर्ष

विदेश में पढ़ाई का सपना आज भी लाखों भारतीय छात्र देखते हैं, लेकिन अब उनकी प्राथमिकताएं बदल रही हैं। अमेरिका की जगह छात्र ऐसे देशों को चुन रहे हैं जहां शिक्षा की गुणवत्ता के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा, रोजगार के बेहतर अवसर और सरल नीतियां भी उपलब्ध हों। आने वाले वर्षों में यह बदलाव वैश्विक शिक्षा बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण ट्रेंड साबित हो सकता है।

Asmita Sarkar

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