
ओडिशा में सरकारी स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में सामने आई बड़ी गड़बड़ी के मामले में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) के पूर्व निदेशक मनोज कुमार पाढ़ी को गिरफ्तार कर लिया गया है। मंगलवार को उन्हें कटक की अदालत में पेश किया गया, जहां से अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया।
यह कार्रवाई कक्षा 1 से 8 तक की सरकारी स्कूलों की किताबों में बड़ी संख्या में तथ्यात्मक, वैज्ञानिक, अनुवाद और संपादन संबंधी गलतियां सामने आने के बाद की गई है। मामले की जांच ओडिशा पुलिस की अपराध शाखा (Crime Branch) कर रही है।
क्या है पूरा मामला?
ओडिशा सरकार द्वारा तैयार और वितरित की गई स्कूली किताबों में 1,600 से अधिक गलतियां मिलने के बाद यह मामला सुर्खियों में आया था। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा उस गलती की हुई, जिसमें महान वैज्ञानिक आइजैक न्यूटन को पायलट बताया गया था। इसके अलावा विज्ञान, भूगोल, अनुवाद और चित्रों से जुड़ी कई गंभीर त्रुटियां भी सामने आई थीं।
विवाद बढ़ने पर मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने विकास आयुक्त डी.के. सिंह की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की थी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर मनोज कुमार पाढ़ी और SCERT के तीन सहायक निदेशकों को पहले ही निलंबित किया जा चुका था।
चार घंटे की पूछताछ के बाद गिरफ्तारी
सरकारी वकील नित्यानंद पांडा के अनुसार, अपराध शाखा के अधिकारियों ने करीब चार घंटे तक पूछताछ के बाद मनोज कुमार पाढ़ी को गिरफ्तार किया। इसके बाद उन्हें कटक के JMFC-3 अदालत में पेश किया गया।
सरकार ने अदालत में उनकी जमानत का विरोध करते हुए कहा कि जांच एजेंसी के पास उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। अदालत ने दलीलें सुनने के बाद उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
हालांकि, पाढ़ी के वकील सुभाषीष मिश्रा ने दावा किया कि उनके मुवक्किल निर्दोष हैं और उन्हें इस मामले में “बलि का बकरा” बनाया जा रहा है।
किस आधार पर हुई कार्रवाई?
अपराध शाखा के अनुसार, मनोज कुमार पाढ़ी उस समय SCERT के निदेशक थे, जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत नई स्कूली किताबें तैयार की जा रही थीं। निदेशक होने के नाते पूरी प्रक्रिया की निगरानी, समन्वय, गुणवत्ता जांच और अंतिम मंजूरी की जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी।
जांच में आरोप है कि उन्होंने तथ्यों, वैज्ञानिक जानकारी, भौगोलिक विवरण, अनुवाद और चित्रों की पर्याप्त जांच किए बिना पांडुलिपियों को प्रकाशन के लिए मंजूरी दे दी। पुलिस का कहना है कि यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ आपराधिक जिम्मेदारी का मामला भी बनता है।
175 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा
पुलिस के अनुसार, त्रुटिपूर्ण किताबों की छपाई और वितरण के कारण सरकारी खजाने को करीब 175 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसी आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। मामले की जांच अभी जारी है और आगे अन्य अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
विपक्ष ने जांच में देरी पर उठाए सवाल
मामले को लेकर विपक्षी दलों ने भी राज्य सरकार को घेरा है। बीजू जनता दल (BJD) और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि अपराध शाखा द्वारा जांच शुरू करने में अनावश्यक देरी की गई।
बीजेडी युवा शाखा के अध्यक्ष चिन्मय साहू ने दावा किया कि देरी के कारण सबूत प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की मांग भी की है।
शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
सरकारी स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में इतनी बड़ी संख्या में गलतियां सामने आने के बाद ओडिशा की शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यपुस्तक तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की शुरुआती शिक्षा में तथ्यात्मक शुद्धता बेहद महत्वपूर्ण होती है और ऐसी चूक भविष्य में उनकी बुनियादी समझ को प्रभावित कर सकती है।
राज्य सरकार ने संकेत दिए हैं कि भविष्य में पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा और गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया को और सख्त बनाया जाएगा, ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।




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