
शिक्षाविद, इंजीनियर और पर्यावरण कार्यकर्ता Sonam Wangchuk इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे अपने आमरण अनशन को लेकर चर्चा में हैं। वे 28 जून 2026 से परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही और कथित अनियमितताओं के खिलाफ अनशन पर बैठे हैं। उनके समर्थन में कई सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद और सार्वजनिक हस्तियां सामने आई हैं, जबकि लगातार गिरती सेहत को देखते हुए उन्हें अनशन समाप्त करने की अपील भी की जा रही है। हाल के स्वास्थ्य अपडेट के अनुसार उनका वजन कई किलो कम हो चुका है और डॉक्टर लगातार उनकी निगरानी कर रहे हैं।
हालांकि, इस आंदोलन के बीच एक सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है—आखिर सोनम वांगचुक कितने पढ़े-लिखे हैं और उन्होंने अपनी शिक्षा कहां से हासिल की? उनका जीवन संघर्ष, शिक्षा और नवाचार का ऐसा उदाहरण है, जिसने उन्हें देश-दुनिया में अलग पहचान दिलाई।
लद्दाख के छोटे गांव से शुरू हुई यात्रा
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के अलची क्षेत्र के पास स्थित उलेटोकपो गांव में हुआ था। उस समय उनके गांव में स्कूल की सुविधा नहीं थी। इसलिए वे लगभग 9 वर्ष की उम्र तक औपचारिक स्कूल शिक्षा से दूर रहे। शुरुआती पढ़ाई उनकी मां ने स्थानीय भाषा में घर पर कराई। बाद में उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए श्रीनगर भेजा गया, जहां भाषा और माहौल दोनों उनके लिए नई चुनौती थे।
उन्होंने बाद में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया था कि शुरू में हिंदी और अंग्रेजी समझने में उन्हें काफी कठिनाई हुई, लेकिन उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे खुद को नई परिस्थितियों के अनुसार ढाला।
NIT श्रीनगर से की मैकेनिकल इंजीनियरिंग
कठिन परिस्थितियों के बावजूद सोनम वांगचुक ने उच्च शिक्षा हासिल की और National Institute of Technology Srinagar से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान वे ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च भी निकालते थे। यह दौर उनके आत्मनिर्भर और संघर्षशील व्यक्तित्व की मजबूत नींव बना।
शिक्षा सुधार के लिए बनाई SECMOL
इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट करियर की बजाय लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाने का रास्ता चुना। वर्ष 1988 में उन्होंने SECMOL की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य ऐसी शिक्षा देना था जो स्थानीय भाषा, संस्कृति और जीवन की जरूरतों से जुड़ी हो।
SECMOL ने पारंपरिक रटने वाली शिक्षा के बजाय ‘करके सीखो’ मॉडल को बढ़ावा दिया। बाद में उन्होंने Himalayan Institute of Alternatives, Ladakh की स्थापना की, जो आज वैकल्पिक शिक्षा, टिकाऊ विकास और हिमालयी क्षेत्रों पर शोध का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
आइस स्तूपा से मिली वैश्विक पहचान
सोनम वांगचुक केवल शिक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने लद्दाख में पानी की कमी की समस्या को देखते हुए आइस स्तूपा तकनीक विकसित की। यह सर्दियों में पानी को शंकु आकार की बर्फ संरचना के रूप में जमा करती है, जो गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलकर खेती और बागवानी के लिए पानी उपलब्ध कराती है। इस नवाचार ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और जल संरक्षण के क्षेत्र में नई सोच प्रस्तुत की।
3 Idiots से जुड़ा नाम, लेकिन पहचान उससे कहीं बड़ी
सोनम वांगचुक का नाम फिल्म 3 Idiots के किरदार ‘फुंसुख वांगडू’ से भी जोड़ा जाता है। माना जाता है कि उस किरदार की प्रेरणा उनके जीवन और काम से ली गई थी। हालांकि, वांगचुक हमेशा कहते रहे हैं कि उनकी असली पहचान शिक्षा, पर्यावरण और समाज के लिए किए गए काम से है।
आज सोनम वांगचुक को केवल एक इंजीनियर या शिक्षक के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है जिसने लद्दाख की कठिन परिस्थितियों से निकलकर शिक्षा, पर्यावरण और समाज के लिए नए रास्ते बनाए। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ संकल्प और शिक्षा किसी भी व्यक्ति को असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।




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