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JPC draft report on the Viksit Bharat Education Foundation Bill ready; proposal to replace UGC and AICTE with a single regulator 

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल पर JPC की ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार, UGC-AICTE की जगह एक नियामक का प्रस्ताव

JPC draft report on the Viksit Bharat Education Foundation Bill ready; proposal to replace UGC and AICTE with a single regulator 

देश में उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक’ पर अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार कर ली है। समिति की अंतिम रिपोर्ट अगले सप्ताह लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी जाने की संभावना है। इसके बाद केंद्र सरकार इस विधेयक को संसद के मौजूदा मानसून सत्र में पेश कर सकती है।

इस प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य देश के उच्च शिक्षा नियामक ढांचे को सरल और अधिक प्रभावी बनाना है। इसके तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) जैसी कई नियामक संस्थाओं की जगह एक एकीकृत नियामक व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है।

एक ही नियामक से आसान होगी व्यवस्था

जेपीसी का मानना है कि अलग-अलग नियामक संस्थाओं के कारण उच्च शिक्षा संस्थानों को कई नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है। समिति के अनुसार, नई व्यवस्था लागू होने पर नियामकीय ढांचा काफी सरल हो जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा 54 प्रमुख नियमों को घटाकर 12 तक सीमित किया जा सकता है। इससे अनावश्यक दोहराव कम होगा और विश्वविद्यालयों व कॉलेजों के लिए अनुपालन प्रक्रिया अधिक आसान बनेगी।

राज्यों की भूमिका बनाए रखने पर जोर

विधेयक को लेकर राज्यों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए समिति ने सहकारी संघवाद को मजबूत बनाए रखने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रस्तावित आयोग और परिषदों में राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों का संरचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि राज्य विश्वविद्यालय अपने-अपने राज्य के कानूनों के अनुसार ही संचालित होते रहेंगे और उनकी कानूनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा।

विश्वविद्यालयों से सलाह लेना हो अनिवार्य

समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि भविष्य में किसी भी नए नियम, गुणवत्ता मानक या निरीक्षण व्यवस्था को लागू करने से पहले विश्वविद्यालयों, राज्य सरकारों और अन्य संबंधित पक्षों से परामर्श लेना कानूनन अनिवार्य किया जाए। इससे नीतिगत फैसलों में पारदर्शिता बढ़ेगी और विभिन्न हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित होगी।

IIT और IIM की स्वायत्तता बरकरार रखने की सिफारिश

ड्राफ्ट रिपोर्ट में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) और राष्ट्रीय महत्व के अन्य संस्थानों की स्वायत्तता बनाए रखने पर भी विशेष जोर दिया गया है। समिति ने सुझाव दिया है कि विधेयक की धारा 49, जो संस्थागत स्वायत्तता की सुरक्षा से जुड़ी है, उसे यथावत रखा जाए। साथ ही ऐसे संस्थानों को प्रभावित करने वाले किसी भी नियम को लागू करने से पहले उनसे अनिवार्य रूप से परामर्श किया जाए।

हिंदी और अंग्रेजी दोनों में जारी रहे आधिकारिक नाम

जेपीसी ने यह भी सिफारिश की है कि प्रस्तावित आयोग और परिषदों के सभी आधिकारिक दस्तावेजों और संचार में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में नामों का उपयोग जारी रखा जाए। समिति का मानना है कि इससे देश के भीतर पहुंच बेहतर होगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थानों की पहचान भी बनी रहेगी।

विपक्ष और राज्यों ने जताई हैं चिंताएं

हालांकि समिति की बैठकों के दौरान कई सदस्यों ने विधेयक के कुछ प्रावधानों पर आपत्तियां भी दर्ज कराई हैं। जानकारी के अनुसार, ये सदस्य अंतिम रिपोर्ट में अपने डिसेंट नोट (असहमति नोट) शामिल कराने की तैयारी कर रहे हैं।

विपक्षी दलों और कुछ राज्य सरकारों का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था से नियामकीय शक्तियां केंद्र सरकार के पास अधिक केंद्रित हो सकती हैं। उनका तर्क है कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है, इसलिए राज्यों की भूमिका और विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।

धारा 15(3)(g) पर क्यों हो रही है चर्चा?

विधेयक की धारा 15(3)(g) को लेकर सबसे अधिक बहस हो रही है। इस प्रावधान के अनुसार प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग केंद्र सरकार के नीतिगत निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होगा। यदि किसी विषय पर मतभेद होता है, तो केंद्र सरकार का निर्णय अंतिम माना जाएगा।

आलोचकों का कहना है कि इससे आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। वहीं, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस आलोचना को खारिज करते हुए कहा है कि यह प्रावधान मौजूदा कानूनी व्यवस्था से अलग नहीं है और वर्तमान नियामक संस्थाओं के कानूनों में भी सरकार को इसी तरह की नीति संबंधी शक्तियां प्राप्त हैं।

फिलहाल विधेयक लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति के पास विचाराधीन है। अंतिम रिपोर्ट संसद में पेश होने के बाद इस पर आगे की विधायी प्रक्रिया तय होगी। यदि विधेयक पारित होता है, तो यह भारत के उच्च शिक्षा नियामक ढांचे में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा संस्थागत सुधार माना जा सकता है।

 

 

 

Asmita Sarkar

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