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AISHE Report 2023-24: Undergraduate admissions drop for the first time—why are student preferences shifting?

AISHE Report 2023-24: पहली बार घटी UG एडमिशन की संख्या, आखिर क्यों बदल रहा है छात्रों का रुझान?

AISHE Report 2023-24: Undergraduate admissions drop for the first time—why are student preferences shifting?

नई दिल्ली: देश में उच्च शिक्षा (Higher Education) को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2023-24 रिपोर्ट के अनुसार, पहली बार देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में अंडरग्रेजुएट (UG) पाठ्यक्रमों में दाखिले की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, पोस्टग्रेजुएट (PG) और पीएचडी (PhD) पाठ्यक्रमों में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल दाखिले के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे नई शिक्षा नीति (NEP 2020), कौशल आधारित शिक्षा पर बढ़ता जोर, महंगी होती उच्च शिक्षा, छात्रवृत्ति योजनाओं में बदलाव और युवाओं की बदलती सोच जैसे कई कारण हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पहली बार UG एडमिशन क्यों घटे और इसका भविष्य की शिक्षा व्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है?

AISHE 2023-24 रिपोर्ट में क्या सामने आया?

AISHE की 2022-23 और 2023-24 रिपोर्ट की तुलना करने पर पता चलता है कि वर्ष 2023-24 में अंडरग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक लाख कम हो गई।

हालांकि, कुल उच्च शिक्षा नामांकन (Higher Education Enrollment) में वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2022-23 में कुल नामांकन 4.46 करोड़ था, जो 2023-24 में बढ़कर 4.50 करोड़ हो गया।

रिपोर्ट के अनुसार, छात्राओं की भागीदारी भी बढ़ी है। 2022-23 में जहां छात्राओं की संख्या 2.18 करोड़ थी, वहीं 2023-24 में यह बढ़कर 2.24 करोड़ हो गई। इसके अलावा, 18 से 23 वर्ष आयु वर्ग का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) भी 29.5 से बढ़कर 30 प्रतिशत पहुंच गया है।

इसका मतलब है कि कुल उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ रहा है, लेकिन पारंपरिक स्नातक पाठ्यक्रमों की लोकप्रियता में पहली बार कमी दर्ज की गई है।

UG एडमिशन में गिरावट क्यों आई?

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं।

पूर्व यूजीसी अध्यक्ष प्रोफेसर सुखदेव थोराट का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के लागू होने के बाद स्कूल स्तर से ही कौशल आधारित शिक्षा (Skill-Based Education) को बढ़ावा दिया गया है। अब कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। इसका असर यह हुआ है कि कई छात्र पारंपरिक डिग्री की बजाय स्किल डेवलपमेंट और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

उनके अनुसार, चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम, मल्टीपल एग्जिट सिस्टम और कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) जैसे बदलावों का भी एडमिशन के रुझान पर असर पड़ा है। मल्टीपल एग्जिट व्यवस्था के कारण कुछ छात्र डिग्री पूरी करने से पहले ही सर्टिफिकेट या डिप्लोमा लेकर पढ़ाई छोड़ रहे हैं।

महंगी होती शिक्षा और कम होती छात्रवृत्तियां भी बनीं कारण

विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक कारण भी UG एडमिशन में गिरावट की एक बड़ी वजह हैं।

पिछले कुछ वर्षों में कई छात्रवृत्ति योजनाएं बंद होने और सरकारी फंडिंग में कमी का असर उच्च शिक्षा पर पड़ा है। सार्वजनिक संस्थानों पर वित्तीय दबाव बढ़ने से कई जगह फीस में वृद्धि हुई है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए कॉलेज शिक्षा पहले की तुलना में अधिक महंगी हो गई है।

प्रोफेसर सुखदेव थोराट के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा (NTSE), सेकेंडरी एजुकेशन के लिए लड़कियों की प्रोत्साहन योजना, बेगम हजरत महल छात्रवृत्ति और मौलाना आजाद नेशनल फेलोशिप (MANF) जैसी योजनाओं के बंद होने का असर भी छात्रों पर पड़ा है। उनका कहना है कि इसका सबसे अधिक प्रभाव सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों पर दिखाई दे रहा है।

रोजगार को लेकर युवाओं की सोच भी बदली

हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर फुरकान कमर का मानना है कि केवल नीतिगत बदलाव ही नहीं, बल्कि युवाओं की प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं।

उनके अनुसार, देश में युवा आबादी की वृद्धि की रफ्तार पहले की तुलना में धीमी हुई है, जिससे स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या भी प्रभावित हो रही है। वहीं, कई परिवार अब यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या महंगी उच्च शिक्षा के बाद रोजगार की पर्याप्त गारंटी मिलती है।

उन्होंने कहा कि देश के अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थान निजी क्षेत्र में हैं, जहां फीस अपेक्षाकृत अधिक है। ऐसे में कई परिवार महंगी डिग्री की बजाय कम लागत वाले स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम, प्रोफेशनल सर्टिफिकेट या रोजगार-केंद्रित कोर्स को बेहतर विकल्प मान रहे हैं।

क्या यह उच्च शिक्षा के लिए चेतावनी है?

विशेषज्ञों का मानना है कि UG एडमिशन में आई गिरावट को केवल नकारात्मक संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह छात्रों की बदलती जरूरतों, रोजगार आधारित शिक्षा की मांग और शिक्षा व्यवस्था में हो रहे बदलावों का भी संकेत है।

हालांकि, यदि आर्थिक कारणों, बढ़ती फीस और छात्रवृत्ति की कमी के चलते छात्र उच्च शिक्षा से दूर हो रहे हैं, तो यह नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय हो सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और शिक्षण संस्थान छात्रों को उच्च शिक्षा की ओर आकर्षित करने के लिए क्या नए कदम उठाते हैं।

 

Asmita Sarkar

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