
AIBE XXI Result Analysis: इस वर्ष आयोजित ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE XXI) में प्रश्न पत्र के पैटर्न में किए गए बड़े बदलाव का सीधा असर परीक्षा परिणामों पर देखने को मिला। इस बार परीक्षा में पारंपरिक रटकर याद किए जाने वाले सवालों की जगह व्यावहारिक समझ (Application-Based) और कानूनी विश्लेषण पर आधारित प्रश्न पूछे गए। इसके साथ ही नए आपराधिक कानूनों को पहली बार प्रमुख रूप से शामिल किया गया। इन बदलावों के कारण बड़ी संख्या में एलएलबी (LLB) स्नातक परीक्षा पास नहीं कर सके।
कानूनी शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम और वास्तविक अदालतों में जरूरी व्यावहारिक कौशल के बीच बढ़ती दूरी, नए कानूनों की पर्याप्त तैयारी का अभाव और समय प्रबंधन में कमजोर प्रदर्शन भी कम सफलता दर के प्रमुख कारण रहे।
मॉडरेशन के बाद भी पास प्रतिशत रहा 66% से कम
पिछले सप्ताह घोषित AIBE XXI के परिणामों के अनुसार, लगभग 1.75 लाख अभ्यर्थियों में से केवल 1.15 लाख उम्मीदवार (65.92%) ही परीक्षा पास कर सके। सफल उम्मीदवारों में 73,045 पुरुष, 42,757 महिलाएं और 3 ट्रांसजेंडर अभ्यर्थी शामिल हैं।
दिलचस्प बात यह है कि यह परिणाम मॉडरेशन (Moderation) के बाद सामने आया। परीक्षा की मॉनिटरिंग कमेटी ने सभी श्रेणियों के लिए 100 अंकों में तीन अंक की छूट देने का फैसला किया। इसके बाद सामान्य और ओबीसी वर्ग के लिए न्यूनतम उत्तीर्ण अंक 45 से घटाकर 42 और एससी, एसटी तथा PwD उम्मीदवारों के लिए 40 से घटाकर 37 कर दिए गए। यदि यह राहत नहीं दी जाती, तो पास प्रतिशत और भी कम हो सकता था।
क्यों बदला गया प्रश्न पत्र का पैटर्न?
दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय की प्रोफेसर वागेश्वरी देसवाल के अनुसार, AIBE के प्रश्नों का स्वरूप बदलने की प्रक्रिया कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुई थी।
उनके मुताबिक, ऑनलाइन परीक्षाओं के दौरान नकल और अन्य अनियमितताओं की चुनौतियों को देखते हुए प्रश्नों का स्तर धीरे-धीरे अधिक विश्लेषणात्मक बनाया गया। अब सीधे तथ्य आधारित सवालों की जगह ऐसी परिस्थितियां दी जाती हैं, जिनमें उम्मीदवारों को कानूनी तर्क, विश्लेषण और सही निर्णय क्षमता दिखानी होती है।
उन्होंने बताया कि अब परीक्षा में Assertion-Reasoning, Matching, Sequencing और ‘गलत विकल्प चुनिए’ जैसे प्रश्न अधिक पूछे जा रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल याददाश्त नहीं, बल्कि उम्मीदवार की वास्तविक पेशेवर तैयारी को परखना है।
नए आपराधिक कानून बने बड़ी चुनौती
AIBE XXI पहली ऐसी परीक्षा थी जिसमें पुराने भारतीय दंड कानूनों की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) को मुख्य पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया गया।
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU), दिल्ली के सहायक प्रोफेसर राघव पांडेय के अनुसार, पहले संक्रमण काल (Transition Phase) के दौरान छात्रों को पुराने और नए दोनों कानूनों से प्रश्न आने की जानकारी दी गई थी। लेकिन इस बार नए कानूनों को पूरी तरह प्राथमिकता दी गई।
उन्होंने कहा कि जिन छात्रों ने पुराने संस्करणों या पुराने सिलेबस के आधार पर तैयारी की थी, उन्हें नए कानूनों की बदली हुई धाराओं और प्रावधानों को समझने में कठिनाई हुई, जिसका असर उनके प्रदर्शन पर पड़ा।
ओपन बुक परीक्षा होने के बावजूद समय बना सबसे बड़ी चुनौती
AIBE एक ओपन बुक परीक्षा है, जिसमें उम्मीदवार परीक्षा केंद्र में Bare Acts साथ ले जा सकते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि Bare Act साथ होने का मतलब यह नहीं कि पूरी परीक्षा उसी पर निर्भर होकर दी जा सकती है।
राघव पांडेय के अनुसार, परीक्षा में 100 प्रश्नों को हल करने के लिए केवल साढ़े तीन घंटे का समय मिलता है। यानी प्रत्येक प्रश्न के लिए औसतन दो मिनट से थोड़ा अधिक समय उपलब्ध होता है।
यदि कोई उम्मीदवार हर उत्तर खोजने के लिए Bare Act पर निर्भर रहता है, तो उसका काफी समय केवल प्रावधान ढूंढ़ने में निकल जाता है। वहीं जिन छात्रों ने पहले से अच्छी तैयारी की होती है, वे Bare Act का उपयोग केवल संदर्भ के रूप में करते हैं और समय बचा लेते हैं।
साल में दो बार परीक्षा होने का भी दिखा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि AIBE को वर्ष में दो बार आयोजित करने का उद्देश्य छात्रों को अधिक अवसर देना था। हालांकि, इसका एक दूसरा प्रभाव भी देखने को मिल रहा है।
प्रोफेसर वागेश्वरी देसवाल का कहना है कि कई छात्र अब परीक्षा को गंभीरता से लेने के बजाय यह सोचकर तैयारी में ढिलाई बरतते हैं कि यदि इस बार सफलता नहीं मिली तो छह महीने बाद फिर मौका मिल जाएगा।
उन्होंने कहा कि कई अभ्यर्थी मॉक टेस्ट नहीं देते, समय प्रबंधन की रणनीति नहीं बनाते और कम वेटेज वाले विषयों की तैयारी छोड़ देते हैं। यही कारण है कि परीक्षा में उनका प्रदर्शन प्रभावित होता है।
किन विषयों में सबसे अधिक होती है कठिनाई?
AIBE के पाठ्यक्रम में कुल 19 प्रमुख विधि विषय शामिल हैं। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार छात्रों को सबसे अधिक कठिनाई प्रक्रियात्मक कानूनों (Procedural Laws) में होती है।
इनमें प्रमुख रूप से सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) और संवैधानिक कानून (Constitutional Law) शामिल हैं।
NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के प्रोफेसर के.वी.के. संथी के अनुसार, प्रक्रियात्मक और संवैधानिक कानूनों से जुड़े प्रश्न केवल परिभाषाएं नहीं पूछते, बल्कि उम्मीदवारों से कानूनी प्रक्रिया, अधिकार क्षेत्र और न्यायिक निर्णयों को वास्तविक परिस्थितियों में लागू करने की क्षमता की अपेक्षा करते हैं।
उनका कहना है कि अधिकांश छात्र सिद्धांत तो समझ लेते हैं, लेकिन सीमित समय में उसे व्यावहारिक परिस्थितियों पर लागू करने में कठिनाई महसूस करते हैं।
बार परीक्षा के लिए छात्रों को कैसे किया जाए बेहतर तैयार?
विशेषज्ञों का मानना है कि विधि शिक्षा और बार परीक्षा की तैयारी के बीच मौजूद अंतर को कम करने के लिए विश्वविद्यालयों को अपने पाठ्यक्रम में बदलाव करने होंगे।
प्रोफेसर संथी का सुझाव है कि प्रक्रियात्मक कानूनों को केवल अंतिम सेमेस्टर के विषय के रूप में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए, बल्कि पूरे एलएलबी कार्यक्रम के दौरान इन्हें महत्वपूर्ण विषय के रूप में शामिल कर नियमित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
वहीं प्रोफेसर राघव पांडेय का कहना है कि लॉ कॉलेजों को छात्रों में Bare Acts पढ़ने की आदत विकसित करनी चाहिए। विशेष रूप से नए आपराधिक कानूनों के अद्यतन संस्करणों का नियमित अध्ययन कराया जाए, ताकि छात्र कानून की संरचना, परिभाषाओं और प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से समझ सकें।
बदलती परीक्षा प्रणाली के साथ बदलनी होगी तैयारी
AIBE XXI के परिणाम यह संकेत देते हैं कि अब केवल सैद्धांतिक ज्ञान के आधार पर सफलता पाना कठिन होता जा रहा है। कानून के छात्रों को नई विधियों की समझ, व्यावहारिक सोच, समय प्रबंधन और विश्लेषणात्मक क्षमता पर समान रूप से ध्यान देना होगा। यही बदलाव भविष्य में बार परीक्षा और कानूनी पेशे दोनों में सफलता की कुंजी साबित हो सकता है।




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