
नीट यूजी 2026 में कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं को लेकर देशभर में उठे विवाद ने एक बार फिर भारत की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्रों के विरोध प्रदर्शन, पारदर्शिता की मांग और परीक्षा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं से जुड़े कानून को और सख्त बनाने का फैसला किया है। इसी दिशा में सरकार ने लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया है।
सरकार का कहना है कि मौजूदा कानून के बावजूद पेपर लीक और संगठित परीक्षा माफिया की गतिविधियों को पूरी तरह रोकने में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसे में नया संशोधन दोषियों के खिलाफ अधिक कठोर दंड, तेज जांच और समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित करने की कोशिश है।
आखिर दो साल के भीतर कानून में संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?
केंद्र सरकार ने फरवरी 2024 में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 लागू किया था। यह देश का पहला केंद्रीय कानून था, जिसे विशेष रूप से भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में होने वाली धांधली, पेपर लीक और परीक्षा माफिया पर रोक लगाने के लिए बनाया गया था।
हालांकि कानून लागू होने के बाद भी कई बड़े विवाद सामने आए। जून 2024 में यूजीसी-नेट परीक्षा रद्द करनी पड़ी और इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई। इसके बाद विभिन्न परीक्षाओं को लेकर सुरक्षा और पारदर्शिता पर सवाल उठते रहे। 2026 में नीट यूजी परीक्षा को लेकर सामने आए विवादों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया कि कानून को और प्रभावी बनाया जाए। इसी पृष्ठभूमि में नया संशोधन विधेयक लाया गया है।
नया संशोधन विधेयक क्या है?
पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य पेपर लीक, उत्तर कुंजी लीक, प्रतिरूपण (इम्पर्सनेशन), संगठित नकल और परीक्षा माफिया के खिलाफ अधिक कठोर कार्रवाई करना है। इसके साथ ही जांच और न्यायिक प्रक्रिया को समयबद्ध बनाकर दोषियों को जल्द सजा दिलाने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।
किन परीक्षाओं पर लागू होगा नया कानून?
यह कानून केंद्र सरकार द्वारा आयोजित प्रमुख सार्वजनिक परीक्षाओं पर लागू होगा। इनमें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB), इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सोनल सेलेक्शन (IBPS), राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित नीट, जेईई और CUET जैसी परीक्षाएं शामिल हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों और अधिसूचित अन्य सार्वजनिक परीक्षाओं पर भी यह कानून लागू होगा।
नए संशोधन में क्या होंगे प्रमुख बदलाव?
संशोधन विधेयक के अनुसार यदि कोई व्यक्ति प्रश्नपत्र या उत्तर कुंजी लीक करता है अथवा परीक्षा में धांधली करता है, तो उसे कम से कम पांच वर्ष और अधिकतम दस वर्ष तक की जेल हो सकती है। साथ ही उस पर ₹50 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।
संगठित परीक्षा माफिया या सिंडिकेट के मामलों में सजा और भी कठोर होगी। ऐसे मामलों में सात से दस वर्ष तक की जेल और ₹10 करोड़ तक के जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है।
यदि कोई परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी या सर्विस प्रोवाइडर धांधली में शामिल पाया जाता है, तो उस पर ₹5 करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा और उसे आठ वर्षों तक किसी भी सार्वजनिक परीक्षा के आयोजन से प्रतिबंधित किया जा सकता है।
जांच में यदि किसी कंपनी के निदेशक, प्रबंधक या वरिष्ठ अधिकारी की मिलीभगत सामने आती है, तो उन्हें भी पांच से दस वर्ष तक की जेल और ₹5 करोड़ तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
जांच और सुनवाई की प्रक्रिया होगी तेज
नए संशोधन की सबसे बड़ी विशेषता जांच और ट्रायल को समयबद्ध बनाना है। सरकार आवश्यकता पड़ने पर मामलों की जांच स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को सौंप सकेगी। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार जांच दो महीने के भीतर पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।
पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों में होगी। अदालतों में रोजाना सुनवाई का प्रावधान होगा और चार्जशीट दाखिल होने के तीन महीने के भीतर मुकदमे का निपटारा करने का लक्ष्य रखा गया है। फैसले के खिलाफ 30 दिनों के भीतर हाईकोर्ट में अपील की जा सकेगी और अपील के निस्तारण को भी समयबद्ध बनाने की कोशिश की जाएगी।
2024 के कानून में क्या प्रावधान थे?
सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 को 12 फरवरी 2024 को पारित किया गया था और 21 जून 2024 से इसे पूरे देश में लागू किया गया। इस कानून के तहत प्रश्नपत्र या उत्तर कुंजी लीक करना, फर्जी परीक्षा आयोजित करना, फर्जी एडमिट कार्ड या नियुक्ति पत्र जारी करना, कंप्यूटर नेटवर्क से छेड़छाड़ करना, मेरिट सूची में हेरफेर करना और परीक्षा से जुड़ी धोखाधड़ी को अपराध घोषित किया गया था।
उस कानून के तहत पेपर लीक या धांधली करने वाले व्यक्ति को तीन से पांच वर्ष तक की जेल और ₹10 लाख तक जुर्माने का प्रावधान था। परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों पर ₹1 करोड़ तक जुर्माना और चार वर्ष तक प्रतिबंध लगाया जा सकता था। संगठित गिरोहों के लिए पांच से दस वर्ष तक की जेल और कम से कम ₹1 करोड़ जुर्माने का प्रावधान था।
पुराने और नए कानून में क्या है सबसे बड़ा अंतर?
विशेषज्ञों के अनुसार 2026 के संशोधन में सजा और आर्थिक दंड दोनों को काफी बढ़ाया गया है। इसके अलावा जांच और सुनवाई की समयसीमा तय करना सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। 2024 के कानून में अपराधों को परिभाषित किया गया था, लेकिन नए संशोधन में दोषियों को जल्दी सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक व्यवस्था और एसटीएफ जांच जैसे प्रावधान जोड़े गए हैं।
क्या 2024 का कानून पेपर लीक रोकने में सफल रहा?
कानून लागू होने के बाद भी कई परीक्षाएं विवादों में रहीं। यूजीसी-नेट परीक्षा रद्द करनी पड़ी और कुछ अन्य परीक्षाओं को एहतियातन स्थगित किया गया। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि परीक्षा सुरक्षा, तकनीकी निगरानी और जवाबदेही को भी मजबूत करना जरूरी है।
राहुल गांधी का क्या दावा है?
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जुलाई 2026 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दावा किया कि पिछले दस वर्षों में देश में 152 बार प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि बार-बार परीक्षा रद्द होने या दोबारा आयोजित होने से लाखों छात्रों को मानसिक, आर्थिक और शैक्षणिक नुकसान उठाना पड़ता है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इन घटनाओं से करोड़ों छात्र और उनके परिवार प्रभावित हुए हैं।
आगे क्या होगा?
लोकसभा में पेश किया गया यह संशोधन विधेयक संसद की मंजूरी मिलने के बाद कानून का रूप ले सकेगा। यदि प्रस्तावित प्रावधान लागू होते हैं, तो भारत में सार्वजनिक परीक्षाओं से जुड़े अपराधों के खिलाफ अब तक की सबसे कठोर कानूनी व्यवस्था लागू हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि कानून के साथ-साथ परीक्षा प्रबंधन, डिजिटल सुरक्षा और निगरानी तंत्र को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी होगा, तभी पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकेगा।




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